Tuesday, 4 October 2011

बिटो तू जा ............लला को भेजना


आज तो तुम्हें बताना ही होगा माँ........... मैं नहीं मानूँगी। इस दिन का इंतजार मुझे कई दिनों से है। मुझे आज अपने बर्थडे पर आपसे और कुछ नहीं चाहिए।”  - श्रेया आज सुबह से ही जिद पकड़ कर बैठी थी।

       कहा तो है तुझे कि बता दूंगी। आज मेरी मुनिया 18 साल ही हो गयी है। जा अपने दोस्तों के साथ मॉल घूम आ। ये कहानी तो मैं तुझे कभी भी सुना दूंगी- उमा ने समझाने की कोशिश करते हुये कहा।

  बिल्कुल नहीं....... आज आपको अपना वायदा निभाना ही होगा। पिछली बर्थडे पर आपने मुझे प्रॉमिस किया था कि जब मैं 18 साल की हो जाऊँगी तो आप मुझे सब कुछ बता देंगी।

       श्रेया को जिद पकड़ते देख एवं अपने वायदे को याद करती हुई उमा बोली  - ठीक है! आज शाम को मैं तुझे सब कुछ सुनाऊँगी। पर पहले तू अपनी सहेलियों के साथ अपना बर्थ डे तो मना ले। श्रेया कुछ संतुष्ट हुई।

       शाम होते ही अपनी समस्त जिज्ञासाओं के साथ वह किचन में चुपचाप अपनी माँ के पास जाकर खड़ी हो गयी। उसका इरादा भांपकर उमा ने उससे कहा कि रात के खाने के बाद ही वह उससे बात करेगी। श्रेया को यह भी मंजूर था।

       रजाई अपने पैरों पर डालती हुई उमा बोली - बता क्या जानना चाहती है ?

       सब कुछ ...... मतलब..... पापा के बारे में, तुम्हारे ससुराल के बारे में, और यह कि...... तुम अकेली कब से रह रही हो..... और हमारा परिवार बाकी लोगों की तरह क्यों नहीं है?

       उमा भी आज श्रेया को सब कुछ बताने के लिए तैयार थी। गंभीर स्वर में उमा ने बताना शुरू किया - मैं भी तुझे सब कुछ बताना चाह रही थी। पर तू मुझे हमेशा छोटी ही लगती रही। पर अब सोचती हूँ कि ऐसे तो तू मुझे हमेशा ही छोटी लगेगी। अब तू एम.बी.बी.एस. की पढ़ाई के दूसरे साल में है। इसलिए आज मैं तुझे सब कुछ बताऊँगी। हो सकता है कि तू मुझे गलत समझने लगे और मेरे निर्णय को गलत ठहराये। पर सब कुछ जानना तेरा अधिकार है।

       कुछ देर ठहरकर उमा फिर से कहना शुरू करती है - तेरे नाना-नानी ने मुझे अपने बेटों की तरह ही पाला - पोसा। बेटों के ही समान शिक्षा दिलाई। हालांकि वे मेरे नौकरी करने के खिलाफ थे। बी.एड. करते समय ही मेरा विवाह तय हो गया था। मेरे बहुत रोने-धोने का इतना असर हुआ कि शादी की तारीख बी.एड. परीक्षा के बाद की तय हुई। तुम्हारे दादाजी किशनगढ़ गाँव के सरपंच थे। अच्छी खेतीबाड़ी और जमींदारी थी। तेरे पापा अपने पाँच भाइयों में सबसे छोटे थे। मैं भी खुश थी। जितना भी समय मिल पाता मुझे तेरे पापा के साथ बात करने में अच्छा लगता था। संयुक्त परिवार होने के कारण सभी बहुऐं एक साथ चौका बर्तन करती थीं। साल भर भी नहीं बीता था जब मेरी पहली संतान होने को थी। गर्भ के नौंवे महीने की शुरूआत में गोद-भराई की रस्म के समय तुम्हारी दादी ने गोद डालते हुए कहा - लल्ला ही देना!’ मैं भी अपने बच्चे का इंतजार कर रही थी। मुझे आज भी याद है कि गाँव की ही एक दाई ने घर में प्रसव कराया था। मैं इतने भयंकर दर्द से गुजरी कि डिलेवरी होने के बाद कुछ समय तक नीम बेहोश रही। मुझे बाद में बताया गया कि मेरी पहली संतान, जो एक लड़की थी, मरी हुई पैदा हुई थी। तेरी दादी ने कुछ दिन बाद मुझे दुःखी देखकर कहा कि कोई लल्ला थोड़े ही था जो इतना रो रही हो।

       अगले ही साल मुझे दूसरी संतान हुई और मैंने पहली बार उसका रोना सुना। मैं पूछना चाहती थी कि क्या हुआ है। पर सास का बुझा हुआ चेहरा देखकर यह समझ गई कि मैंने फिर एक लड़की को ही जन्म दिया है। कुछ देर बाद मुझे यह बताया गया कि बिटो के फेंफड़े में पानी रह गया था। साँस ले पाने के कारण चल बसी। मैं बुरी तरह छट-पटाकर रह गयी थी। मैं कुछ दिन तक यही सोचकर अपने आप को दिलासा देती रही कि शायद नियति को यही मंजूर था।  तीन महीने बाद ही तेरी ताईजी को प्रसव से गुजरना पड़ा। उस कमरे में मेरा जाना मना था। पर मैंने नवजात की किलकारी सुनकर उत्सुकतावश छज्जे से झाँककर देखा तो तेरी दादी उस नवजात के मुँह में तम्बाकू का घोल डाल रही थी ...... कहते-कहते उमा फफ़क़ कर रो पड़ी।

       श्रेया को अब भी कुछ समझ में नहीं आया। आँसू पोंछते हुए रुधे गले से बोली - तम्बाकू ! पर क्यों ! आखिर दादी ऐसा क्यों कर रही थीं ?.......और बच्चे का क्या हुआ?

         बिटो तू जा ......लला को भेजना ......ये शब्द आज भी मेरे कानों में गूँजते रहते हैं। बेचारी नवजात थोड़ा सा कसमसाई और चल बसी। मैं घुटकर रह गयी। कई दिनों तक किसी से बात करने की तो हिम्मत हुई इच्छा।

       तुमने पापा से कुछ नहीं कहा ? - श्रेया ने रोते हुए कहा।

       तेरे पापा से तो मुझे बात करने का मौका ही कब मिलता था। सबके सामने वे मुझसे बात नहीं करते थे। देर रात तक घर का काम निपटाने के बाद ऐसा कई बार होता कि तेरे पापा सो चुके होते थे। कुछ दिन बाद हिम्मत जुटा कर मैंने उन्हें सब कुछ बता दिया। उस समय मुझे बहुत धक्का लगा जब तेरे पापा ने मुझे समझाने मनाने के बजाय धमकाया कि मैं यह बात फिर कभी अपनी जुबान पर लाऊँ।

       समय गुजरता गया और धीरे-धीरे यह बात मुझे पता चल चुकी थी कि नवजात लड़कियों को जन्म लेते ही मार देने का जघन्य पाप प्रायः गाँव के हर घर में होता था। मेरा दम घुटने लग गया था। जो ससुराल मुझे अपने मायके जैसी ही लगती थी अब मुझे जेल जैसी लगने लगी थी। सभी लोग मुझे हिंसक पशुओं की तरह लगने लग गये थे। कहते-कहते उमा का गला सूख गया।

       श्रेया ने पानी देते हुए पूछा - पर आखिर दादी ऐसा करती क्यों थीं? वो भी तो आखिर एक महिला थीं।

       उमा ने थोड़ा सोचते हुए कहा - पहले मुझे भी यह समझ नहीं आया कि आखिर कोई महिला ऐसा कैसे कर सकती है। मुझे तुम्हारी दादी में एक जघन्य अपराधी की छवि दिखने लगी थी। मैं उनसे इतना डरने लग गयी थी कि उनके सामने जाते ही काँपने लगती थी। मुझे कई साल लग गये यह समझने में कि तेरी दादी ने जो किया वह तो सिर्फ अभिव्यक्ति थी, उसका मूल विचार तो नेपथ्य में था। शायद तेरी दादी भी ऐसा करने को विवश थीं। जन्म से लेकर मरने तक हमारे समाज में महिलाओं को जितनी बंदिशों का सामना करना पड़ता है, शायद उसी अंतहीन कष्टों की श्रृंखला से नवजात बच्ची को छुटकारा दिलाना उनका उद्देश्य रहा हो। ......... पर मैं आज तक इस बारे में ठीक से कुछ नहीं जान पायी हूँ।

       मैं नहीं मानती कि दादी विवश रही होंगी। किसी की हत्या को किसी हालत में जायज नहीं ठहराया जा सकता और अगर ऐसा करने को वे मजबूर थीं तो इस घृणित काम को घर का ही कोई पुरूष क्यों नहीं कर सकता था। वहीं क्यों ? - श्रेया गुस्से में तमतमाते हुए बोली।

       अगले ही पल अपने को संयत करते हुए उसने पूछा - फिर क्या हुआ ?

       मैं फिर गर्भवती हुई। दिन-रात सोचती रहती कि अपनी आने वाली संतान को कैसे बचा पाऊंगी। तू होने को थी कि रक्षाबंधन के लिए तेरे नाना मुझे विदा कराने गये। तेरे नाना ने पिछली दो नवजात मौतों का हवाला देते हुए कहा कि अगली संतान शहर में पैदा होनी चाहिए ताकि जीवित रह सके। उनका विरोध कोई नहीं कर सका। आखिर उनके पास बहाना ही क्या था। मैं इस बार अपने मायके जाते क्त शायद सबसे ज्यादा खुश थी। विदा करते समय भी तेरी दादी ने मेरे कान में कहा कि - लल्ला ही लेकर लौटना

       मैं उस जेल से बाहर चुकी थी। तेरा जन्म मेरे जीवन में नई खुशियाँ लेकर आया। मैं तुझे अपनी गोद में पाकर खुश थी। बस एक ही ग़म था कि तेरे पापा तुझे देखने नहीं आये थे। लड़की के जन्म का समाचार पाकर उस घर से कोई तुझे देखने नहीं आया। तेरे नाना ने बात संभालने की कोशिश की थी पर वे भी खाली हाथ लौटे। पता नहीं उनके साथ क्या सुलूक किया गया था कि लौटकर आते ही उन्होंने मुझे कह दिया कि अब मुझे उन्हीं के पास रहना होगा।

       मैंने कई वर्ष तेरे पापा का इंतजार किया पर वे नहीं आये। मुझे शायद आज भी उनका इंतजार है। कुछ दिन बाद मुझे यह नौकरी मिल गयी। तेरे नाना-नानी के गुजरने के बाद से मैं इस घर में रह रही हूँ। आज 18 वर्ष हो गये...... मैं अपने ससुराल गयी वहाँ से कोई मेरी सुध लेने आया। मैंने भी यह ठान लिया था कि ऐसे ससुराल और पति के होने से अच्छा यह है कि मैं सारा जीवन अकेले ही गुजार लूँ। पता नहीं मैंने सही किया या गलत पर तुझे अपनी आँखों के सामने बड़ा होते देखना मुझे हर ग़म भुला देता है। तुझे अब तक ये बातें इसलिए नहीं बतायीं थी कि कहीं तुम भी मुझे गलत समझ बैठो।.....उमा ने भरभराये हुये गले से कहा।

       श्रेया अब और कुछ जानना नहीं चाहती थी। उसके मुँह से शब्द भी नहीं फूट रहे थे। उसने धीरे से अपनी माँ की गोद में सिर रख दिया........

            22.09.2011

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