Monday, 24 September 2018

महि‍ला मुक्‍ति‍ का कोई रटा-रटाया फार्मूला नहीं हो सकता

इस पुरुषवादी समाज में महि‍ला मुक्‍ति‍ का कोई रटा-रटाया फार्मूला नहीं हो सकता। जैसे - जैसे महि‍लायें पुरुषों के क्षेत्र में दखल देती जायेगी, ये टकराव और बढ़ेगा। आखि‍र अपने हि‍स्‍से की सुखसुवि‍धा पुरुष ऐसे ही तो नहीं छोड़ देंगे। परंतु मुक्‍ति‍ का कारवां भी इसी संघर्षमय पथ से जायेगा। महि‍लायें भी ये मानना छोड़ दें कि‍ चीख पुकार मचाने, अपने पूर्व प्रेमी के खि‍लाफ एफ.आई.आर. कराने, तथा कठोर कानून बनवाने से शोषण की व्‍यवस्‍था समाप्‍त हो जायेगी। अपनी जीवि‍का के लि‍ए आत्मनि‍र्भर बनना सि‍र्फ एक शुरूआत है। उससे कहीं अधि‍क आवश्‍यक है वर्जनायें तोड़ना। शारीरि‍क श्रम के वे काम भी सहर्ष करना जि‍न्‍हें महि‍लायें भी पुरुषों के काम ही मानती रही हैं, जैसे - स्‍टेशन पर आधा सामान स्‍वयं उठाना न कि‍ खुद पानी की बोतल टांगकर खड़े हो जाना और पति‍ के कंधों पर बोझ लाद देना, गैस का सि‍लेंडर सरकाते हुए कि‍चन तक ले जाना इत्‍यादि‍....... । इस संबंध में मुझे नि‍रमा वाशिंग पाउडर का वह वि‍ज्ञापन पसंद है जि‍समें हेमा, रेखा, जया और सुषमा कीचड़ में फंसी कार को धक्‍का देने के लि‍ए अपने वस्‍त्रों की परवाह न करते हुए कीचड़ में कूद जाती हैं।..................... जरा सोचि‍ये कि‍ बंद कार को धक्‍का लगवाने से स्‍त्री मुक्‍ति‍ की राह खुलेगी या स्‍कूटी बंद हो जाने पर कि‍सी पुरुष से कि‍क ल्रगवाने से......

- 2013 की पोस्‍ट

सनातन धर्म में सबका योगदान

दो लद्दाख यात्राओं और एक भूटान यात्रा के बाद जो कुछ बातें मुझ नास्तिक (यहाँ यह शब्द इसलिए क्योंकि मैं संसार के किसी संस्थागत धर्म के प्रति भावुक नही हूँ) को संमझ आईं वे यह हैं कि -
1. सनातन धर्म सिर्फ हिंदुओ का, अथवा हिन्दू ही सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व नही करते।
2. सनातन धर्म में जो दार्शनिक ऊंचाई दृष्टिगोचर होती है, वह सिर्फ आस्था, परम्परा और मूर्तिपूजा का ही विस्तार नही हैं। सनातन के विकास में बौद्ध, जैन, आजीवक, भौतिकवादी नास्तिक, शून्यवादी, एकेश्वरवाद, नाथपंथ....के साथ साथ सैकड़ो श्रमणों/भिक्षुओं का योगदान है।
3. बुद्ध को अवतार मान लिया, महावीर को नही माना, इससे कोई विशेष अंतर नहीं आता। जब हम दर्शन की बात कर रहे होते हैं, तब निज धर्म और व्यक्तिगत आस्था को एक कोने में रखना ही उचित।
4. बुद्ध को अवतार घोषित करने के कई अन्य कारण भी है, जिससे वर्चस्व बना रहे।
5. बुद्ध का धर्म भी कालांतर में विभिन्न मतों में विभक्त हुआ।
भूटान में तो वज्रयानी परंपरा मांस, मदिरा, सेक्स को भी स्वीकार कर रही है।
6. बुद्ध विहारों में नव प्रशिक्षुओं को उसी तरह पोथी बाँचनी पढ़ रही है, जैसे बनारस का पंडिताई स्कूल हो या मदरसे का घोटा।

7. अब तक का निष्कर्ष यही कि संस्थागत होते ही धर्म का पतन होने लगता है। दार्शनिकता की जगह वर्चस्व की लड़ाई और आर्थिक कारण उभर जाते हैं। ऐसे में विवेकानंद की अप्रोच ही अच्छी कि जहाँ से भी ज्ञान प्राप्त हो, उसे ग्रहण करो। सभी मुक्ति के मार्ग हैं।
पर दिक्कत यही कि मुक्ति की लालसा ही हमे स्वार्थी और लोलुप बना देती है। यही भ्रम है यही माया।

- मई 2018

राधा-गोविंद पवित्र भोजनालय

कार से ग्वालियर से जयपुर जाते समय रास्ते में कई ढ़ाबे मिलते हैं। राजस्थान सीमा लगते ही ढाबों पर "पवित्र" और "ट्यूरिस्ट" शब्द बहुतायत से दृष्टिगोचर होते हैं, जैसे - "गोवर्धन पवित्र ट्यूरिस्ट भोजनालय एंड रेस्टोरेंट"।
"पवित्रता" पर इतना जोर और कहीं नही देखा। मेरी जिज्ञासा पर ससुर साहब ने एक रोचक किस्सा सुनाया। बात लगभग 40 साल पुरानी है। पी.एच.ई.डी. विभाग में उनके अधीनस्थ एक चतुर्थ श्रेणी कार्मिक कार्यरत था - अब्दुल हमीद खान। उनके पिता जी लतीफ़ खान (काल्पनिक नाम) ने जयपुर के प्रसिद्ध एम.आई. रोड पर मांसाहारी भोजनालय खोला था, जो कुछ खास नही चल रहा था। घाटे से परेशान होकर उन्होंने मासाहारी भोजनालय बंद करके शाकाहारी भोजनालय खोल दिया। नाम रखा - "राधा-गोविंद पवित्र भोजनालय"।
सुनते हैं उसके बाद भोजनालय चल निकला। पता नही एम.आई. रोड पर अब भी है वह भोजनालय या वुडलैंड का शोरूम खुल गया?


मई 2018

सलाद - हिन्दू चटनी - मुस्लिम

सलाद - हिन्दू
चटनी - मुस्लिम
हींग की गोली - हिन्दू
चूरन - मुस्लिम
शोभायात्रा - हिन्दू
जुलूस - मुस्लिम
गाय - हिन्दू
बकरी -मुस्लिम
बारिश - हिन्दू
सूखा - मुस्लिम
सुबह - हिन्दू
रात - मुस्लिम
..... कुछ आप लोग जोड़ दीजिये अपनी ओर से।

- अप्रैल 2018

प्रश्न और निंदा से भागना दरअसल उपनिषद के ज्ञान से विमुख होना है।

इसमें किस मूर्ख को संदेह होगा कि भारत का भूतकाल ज्ञान , विज्ञान और जीवन के हर क्षेत्र में सर्वोपरि रहा है। अगर मैं भारत के प्राचीन वैभव पर बोलू तो 01 घंटा कम पड़ जाए। ऐसी महान उदात्त संस्कृति दुनिया मे कहीं नही थी। जो समकालीन संस्कृतियां थी भी, तो वे भी भारत से निरंतर सीखती रहीं।
यहाँ तक तो ठीक है। अब वर्तमान दुर्दशा को देख वामपंथी (बेहतर होगा प्रगतिशील) अगर इन बातों पर प्रश्न पूछते हैं तो क्या गलत करते हैं? आखिर निंदक नियरे राखिये भी तो हमारी संस्कृति में ही था -
1. जिस हिंदुत्व को सनातन संस्कृति का वाहक बताया जाता है, वह अपनी मूल पूजोपासना पद्यति से इतनी दूर कैसे खिसक गया?
2. प्रकृति पूजक/ यज्ञ उपासक समाज कैसे मूर्ति पूजक हो गया और लगभग हर जल स्रोत को प्रतिमा विसर्जन से तबाह करने का जिम्मेदार है?
3. पूर्व वैदिक और वैदिक कालीन नारी स्वतंत्रता (स्वयंबर प्रथा/ गन्दर्भ विवाह) आखिर कैसे खाप पंचायत तक आ पहुंची?
4. विश्व वन्धुत्व का नारा साम्प्रदायिक नफरत में कैसे बदल गया?
5. सत्यमेव जयते से फेक न्यूज़ तक की उड़ान किस तरह सामने आई?
6. आनो भद्रा कृत्वो यन्तु विश्वतः आखिर क्यों पश्चिमी ज्ञान और वामियों के तर्क से भयभीत है?
7. जीव कल्याण और कण कण में भगवान देखने वाला मुल्क इतना हिंसक कैसे हो रहा है?

ऐसे सैकड़ो प्रश्न हैं जिनके उत्तर समस्त पूर्वाग्रहों के बावजूद खोजे जाने चाहिए।
याद रखिये प्रश्न और निंदा से भागना दरअसल उपनिषद के ज्ञान से विमुख होना है।

- अप्रैल 2018

गाँधी और नेहरू जिम्मेदार हैं।

कुछ प्रश्न और संभावित उत्तर -
1. क्या अधिकांश भारतीय भ्रस्ट और नैतिक रूप से पतित नहीं है? (भ्रस्टाचार सिर्फ आर्थिक नहीं होता)
2. क्या भारतीय समाज मूलतः अहिंसक है? (बुद्ध, महावीर और गाँधी के मुल्क में फौजदारी के मुकदमो की संख्या?)
3. रास्ते पर जाती युवती की ओर आम भारतीय की निगाहें कैसी होती हैं?
4. भारत मे जातिवाद और तत्सम्बन्धी भेद है या नही?
5. भारत की वर्तमान व्यवस्था में न्याय है?
6. क्या हमारे समाज मे कोई किसी का शोषण नही करता?
ऐसे ही कई संभावित प्रश्नों के सरल उत्तर निम्नवत हो सकते हैं -
1. सब वामियों का किया धरा है।
2.पहले हम ठीक थे, मुस्लिमों के बाद सब गड़बड़ हुई।
3. गाँधी और नेहरू जिम्मेदार हैं।

- अप्रेल 2018

संतुलन का रास्ता

इस बात पर शायद ही किसी का मतांतर होगा कि विज्ञान से तकनीकी और प्रौद्योगिकी ने हमारे जीवन को बदल कर रख दिया है। आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व आनंद भवन इलाहाबाद में प्रो. यशपाल का एक व्याख्यान सुना था जिसमें उन्होंने कहा था कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास की दर इतनी तीव्र है कि हर 05 साल में मानव जाति के पास अब तक उपलब्ध सारी सूचनाएं दोगुनी हो जाती हैं।
पिछले 30-35 साल में मैंने अपने ठीकठाक होश में न जाने कितने परिवर्तन खुद देखे और महसूस किए हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने हमे कई समस्याओं से निजात दिलाई है। पिछले कुछ सालों में ही भारत से पोलियो जैसी भयावह बीमारी का उन्मूलन हुआ है। इस प्रौद्योगिकीय विकास पर मुग्ध होने के साथ कुछ बातें हैं जो मुझे दुःखी करती हैं। स्मृति के आधार पर कुछ लिख रहा हूँ, बाकी आप लोग जोड़ सकते हैं -
1. हमने कई नदियां और वन लुप्त कर दिए हैं। मेरे बचपन का बयाना नाला अब सच मे नाला है। किसी जमाने मे उसमे नहाया हूँ।
2. नदियों और जलाशयों को हमने अपनी धार्मिक कुप्रथाओं के चलते लगभग मार डाला है। ललितपुर का सुमेरा ताल और बांध निरंतर प्रतिमा विसर्जन से लुप्त होने की कगार पर हैं।
3. आवश्यकता के लिए जंगल मे लकड़ी की कोई कमी नहीं है, पर लालच और व्यवसाय के लिये होनी वाली कटाई कई जंगलों को लील गयी है।
4. गाँवों की निरंतर उपेक्षा और कृषि के घाटे के व्यवसाय में तब्दील होने के कारण गाँवों से शहरों की ओर हुए पलायन ने गाँव और शहर दोनों को उजाड़ दिया है।
5. हम पूरी निर्ममता से जमीन से अयस्क और पत्थरों का उत्खनन कर रहे हैं।
कहने को तो हम विकास कर रहे हैं, पर वास्तव में हम खुद को तबाह कर रहे हैं।
संतुलन का रास्ता हमे स्वयं खोजना होगा।

मार्च 2018