Wednesday, 27 July 2011

लोककवि "घाघ"


हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में लोक कवियों का विशेष योगदान रहा है। लगभग प्रत्येक कालखंड में लोक कवियों ने अपनी लेखनी एवं बोली से तत्कालिक जन संस्कृति व जीवन शैली को अभिव्यक्त किया है। किसी अंचल विशेष की लोकसंस्कृति, जनमानस के कार्यकलाप, उनकी मान्यताओं और कुरीतियों के साथ चारित्रिक गुणों इत्यादि का बखान लोक कवियों के कृतित्व में दृष्टिगोचर होता है। यदि आंचलिकता व तत्कालीन जीवनशैली के वर्णन को लोककाव्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता माना जाये तो ज्यादातर भक्तिकालीन कवि लोककवियों की ही श्रेणी में खड़े नजर आते हैं।

      प्रायः यह पाया गया है कि लोककवियों के स्वभाव में फक्कड़पन होने के कारण उनका काव्य श्रुति परंपरा या बोलचाल तक ही सीमित रहा है। उनका संपूर्ण काव्य लिपिबद्ध न हो पाने के कारण समय के साथ-साथ विस्मृत एवं विलुप्त होता जाता है। प्रायः मुहावरों के रूप में प्रयोग होने वाले उनके मुक्तक पीढ़ी दर पीढ़ी घटते जा रहे हैं। हालत यहाँ तक आ पहुँची है कि वर्तमान पीढ़ी उनकी रचनाओं से तो क्या, उनके नाम से भी परिचित नहीं है।

       विस्मृत होते जा रहे ऐसे ही एक लोककवि "घाघ" हैं जिनकी रचनायें आम जनमानस से उनकी नजदीकी स्वतः ही बयान करती हैं। 'घाघ' प्रायः लोकोक्तियों या कहावतों के रूप में ठेठ हिंदीभाषी क्षेत्र में, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, प्रचलित हैं। कुछ उदाहरण –

नस कट पनही, बतकट जोय।
जो पहलौठी बिटिया होय।।
पातरि कृषि, बौरहा भाय।
घाघ कहैं दुःख कहा समाय।।

(नस काटते हुए जूते, बात काटने वाली पत्नी, पहले पैदा होने वाली लड़की, पाला मारी हुई खेती,
और मंदबुद्धि भाई होने से दुःख अंतहीन हो जाते हैं।)
****

ताका भैंसा गादर बैल, नारि कुलच्छनि बालक छैल।
इनसे बाँचे चातुर लोग, राज छोड़ के साधै जोग ।।

(टेढ़ी नजरों या दो तरह की नजरों वाला भैसा, हल जोतते समय बार - बार बैठ जाने वाला बैल , बुरे लक्षणों वाली महिला एवं उचक्के लड़के से समझदार लोगों को बचना चाहिए, इनकी संगत को छोड़ने के लिए भले ही राजसुख छोड़ कर जोगी बनना पड़े।)

      "घाघ" के जन्मस्थान और समय के बारे में प्रमाणिक जानकारी का अभाव हैं। परंतु हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा पं. रामनरेश त्रिपाठी के संपादकत्व में कई वर्षों पूर्व द्वारा प्रकाशित ग्रंथ "कविता कौमुदी" के हिंदी काव्य खंड में तथा हिंदुस्तानी ऐकेडमी, प्रयाग द्वारा प्रकाशित "घाघ और भड्डरी" नामक पुस्तक में "घाघ" का जिक्र है, जिसमें उनका जन्म सन् 1753 में कन्नौज के पास चौधरीसराय नामक गाँव में हुआ बताया गया है, यद्यपि उन्हें फतेहपुर जिले एवं छपरा का भी निवासी बताया जाता है। इसके अलावा उन्हें ग्वालियर, मध्यप्रदेश से भी संबंधित बताया जाता है। ग्वालियर अंचल में 'घाघ' तथा 'जगनिक' लोककवि के रूप में जाने जाते हैं। यद्यपि 'घाघ' की प्रचलित रचनाओं में कतिपय शब्द ऐसे मिलते हैं जो ग्वालियर अंचल में प्रचलित न होकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में प्रचलित हैं, जैसे - भकुवा, पासी, मेहरारू इत्यादि। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं -

घर घोड़ पैदल चले, तीर चलावे बीनि ।
थाथी धरे दमादे घर, जग में भकुआ तीनि ।।

(घर में घोड़ा होने पर भी पैदल चलने वाले, बीन - बीन कर तीर चलाने वाले और दामाद के
पास संपत्ति रखने वाले ये तीनों लोग इस संसार में बेवकूफ होते हैं।)

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बिन बैलन खेती करें, बिन भैयन को रार ।
बिन मेहरारू घर करैं, चौदह साख लबार ।।

(बिना बैल के खेती करने, बिना भाइयों के दुश्मनी करने, और बिना पत्नी के घर
बसाने की बात करने वाला चौदह पीढ़ियों का झूठा होता है।)

   "घाघ" का कोई प्रामाणिक काव्य संग्रह उपलब्ध नहीं है। वे श्रुति परंपरा द्वारा ही कहावतों में अपना नाम अमर किये हुये हैं। उनकी कहावतें पूर्वी उत्तर प्रदेश, अवध व चंबल के इलाकों में प्रचलित रही हैं। "घाघ" ने चुटीले व्यंग्यों के अलावा नीति विषयक, प्रकृति या मौसम विषयक बातें कहावती शैली में कही हैं। उनकी कविताओं की लोकप्रियता का एक कारण यह भी रहा है कि उन्होंने सामान्य जनमानस के लिए काव्य रचना की है -
बैल चौंकना जोत में, औ चमकीली नार।
ये बैरी हैं जान के, कुसल करैं करतार।।

(खेती करते समय चौंकने वाला बैल और हर समय सजधज और मटक कर
रहने वाली औरत जान के दुश्मन होते हैं, प्रभु इनसे रक्षा करे।)

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उत्तम खेती मध्यम बान।
निकृष्ट चाकरी, भीख निदान।।
खेती करै बनिज को धावै।
ऐसा डूबै थाह न पावै।।

(जीवनयापन में कृषिकार्य उत्तम श्रेणी का, बनिए का कार्य मध्यम श्रेणी का और नौकरी निकृष्ट श्रेणी
की और भीख सबसे निम्न श्रेणी की होती है। जो व्यक्ति खेती के लिए साहूकार के पास जाता है, उसका डूबना तय है।)   

   "घाघ" की कविताओं के विषय आसपास के ग्रामीण परिवेश व जीवन से लिये गये हैं। उनकी कविताओं में तत्कालीन सामाजिक आर्थिक व्यवस्था दृष्टिगोचर होती है। उनके कुछ व्यंग्य प्रधान छंद दृष्टव्य हैं -

बनिय क सरखज ठकुर क हीन।
बयद क पूत व्याधि नहिं चीन।।
पंडित चुपचुप बेसवा मइल।
  कहैं घाघ पाँचों घर गइल।।

(यदि बनिया का पुत्र शाहखर्च हो, ठाकुर का पुत्र दमदार न हो, वैद्य का पुत्र बीमारी न पहचाने, पंडित चुप रहने वाला हो और वेश्या मैली कुचैली हो, तो इन सबका पराभव होता हैं।)


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उधारि काढ़ि व्यौहार चलावैं, छप्पर डालें तारो ।
सारे के संग बहिनी पठवें, तीनिन का मुँह कारो ।।

(उधार लेकर व्यवहार करने वाले, टूटे छप्पर पर ताला डालने वाले और साले के साथ अपनी
बहिन को भेजने वाले का मुँह अंततः काला ही होता है।)

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आलस नींद किसानै नासै, चोरै नासै खाँसी ।
अंखिया लीबर बेसवै नासै, बाबै नासै दासी ।।

(आलस्य और नींद किसान का , खाँसी चोर का , कीचड़ भरी आँखें
वेश्या का और दासी साधू के नाश का कारण बनती है।)

      "घाघ" ने ठेठ ग्रामीण बोलचाल भाषा में अपनी बात कही। संभवतः इसी कारण वे लोक परंपरा के अंग बन सके। वे तीखे व्यंग्यों के अलावा अत्यंत साधारण तरीके से नीति विषयक बातें कह गये हैं। उनकी ज्यादातर कवितायें ग्रामीण व किसान जीवन को गहराई से अभिव्यक्त करती हैं। नीति विषयक बातें कहने के लिये भी उन्होंने आम ग्रामीण जीवन से ही प्रतीक और बिंब लिये हैं -

नसकट खटिया दुलकन घोर।
कहे घाघ यह विपत की ओर।।
बाछा बैल पतुरिया जोय।
न घर रहे न खेती होय।।

(लंबाई में छोटी खाट जिसकी पाटी पर एड़ी की नस दबती हो, और दुलक कर चलने वाला घोड़ा, विपत्ति की ओर इशारा करते हैं, बैल की जगह बछड़ा होना और गृहस्थी के अनुभव से रहित नई दुल्हन, खेती और घर के योग्य नहीं होते हैं।)

****

सुथना पहिरे हर जोतै, औ पौला पहिरि निरावैं।
घाघ कहैं ये तीनों भकुवा, सिर बोझा और गावैं।।

(पायजामा पहन कर हल जोतने वाले, और खड़ाऊँ पहनकर निराई करने वाले और सिर पर बोझा
होने पर भी गाना गाने वाले, ये तीनों बेवकूफ होते हैं।)

      उनके काव्य में जहाँ एक ओर सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ चित्रण दिखायी देता है वहीं दूसरी ओर ऐसा लगता है कि वे जनता को नीतिगत संदेश देना चाह रहे हैं -

ना अति बरखा, ना अति धूप।
ना अति बकतर, ना अति चूप।।

( न अधिक बरसात होनी चाहिए न अधिक धूप, इसी तरह
न अधिक बोलना चाहिए न अधिक चुप रहना चाहिए!)

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लरिका ठाकुर, बूढ़ दीवान।
ममिला बिगरै,साँझ विहान।।

(नौजवान ठाकुर और बुजुर्ग दीवान के होने पर सुबह-शाम मामला बिगड़ता ही रहता है!)


बाध, बिया, बेकहल, बनिक, बारी, बेटा, बैल।
ब्योहर बढ़ई, बन, बबुर, बात सुनो यह छैल।।
जो बकार बारह बसैं, सो पूरन गिरहस्त।
औरन को सुख दे सदा, आप रहै अलमस्त।।

(बाध (जिससे खाट बुनी जाती है), बीज, बेकहल (ढाक की जड़ की छाल), बनिया, फुलबारी, बेटा, बैल,  उधार पर धन देना, बढ़ई, कपास, बबूल और बात; ये बारहों चीजें जिसके पास हों, वह पूर्ण ग्रहस्थ होता है, ऐसा व्यक्ति खुद तो मस्त रहता ही है, दूसरों को भी सुख प्रदान करता है।

      "घाघ" की रचनाओं से ऐसा प्रतीत होता है कि वे पेशे से किसान थे। उनकी रचनाओं में कृषिकर्म या किसान के सरोकारों का विस्तार से वर्णन मिलता है। कहीं - कहीं तो ऐसा लगता है कि वे किसानों को शिक्षित करने का भी प्रयास कर रहे हैं -

गया पेड़ जब बकुला बैठा।
गया गेह जब मुड़िया पैठा।।
गया राज जहँ राजा लोभी।
गया खेत जहँ जामी गोभी।।

(जिस पेड़ पर बगुला बैठने लगे वह पेड़ नष्ट हो जाता है, वह घर नष्ट हो जाता है जहाँ साधू-संन्यासियों का आना-जाना हो, ऐसा राज्य नष्ट हो जाता है जहाँ का राजा लोभी हो, ऐसा खेत नष्ट हो जाता है जहाँ गोभी
(एक प्रकार की घास) होती हो।)
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माघ क ऊखम, जेठ का जाड़।
पहिले बरिखे भरिगै ताल।।
कहैं घाघ हम होहिं बियोगी।
कुँआ खोदि के धोइ हैं धोबी।।

(जब माघ महीने में गर्मी पड़े, जेठ महीने में जाड़ा पड़े, पहली ही बरसात में तालाब भर जाये, घाघ कहते
है कि तब ऐसा सूखा पड़ेगा कि पलायन करना पड़ेगा और धोबी को कुंये के पानी से कपड़े धोना पड़ेगा।)

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नीचे ओद ऊपर बदिराई, कहे घाघ अब गेरुई धाई।
पछिवा हवा ओसावै जोई, घाघ कहैं घुन कबहुँ न होई।।

( खेत में ओस या नमी हो ऊपर बादल छाये हुए हो तो मक्के की फसल में लाल रोग लग जाता है,
पछुवा पवन बहते समय फसल की ओसाई करने या फटकने पर उसमें कभी घुन नहीं लगता।)

      समाज में व्याप्त खामियाँ "घाघ" की नजर से बच नहीं पायीं। उनकी रचनाओं में सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ व्यंग्य का अद्भुत संगम है -

बूढ़ा बैल बिसाहे, झीना कपड़ा लेय ।
अपुन करै नसौनी, दैवे दूषण देय ।।

(बूढ़ा बैल खरीदने और झीना कपड़ा लेने पर व्यक्ति अपना नुक्सान स्वयं करता है
तथा देवताओं को व्यर्थ ही दोष देता हैं।)


      किसान की सबसे बड़ी अभिलाषा होती है कि मानसून की बारिश अच्छी हो, ताकि कृषि उपज व उनकी स्थिति बेहतर हो सके । 'घाघ' ने सर्वाधिक रचनायें बारिश या मानसूनी वर्षा को लेकर ही की हैं -

दिन में बद्दर, रात निबद्दर, चले पुरवाई छब्बर-छब्बर।
घाघ कहैं कुछ होनी होई, कुँए का पानी धोबी धोई।।

(दिन में बादल छाए हों तथा रात में बादल छट जायें और धीरे-धीरे पूरवा हवा चल रही हो, घाघ कहते हैं कि ऐसी स्थिति में कुछ खराब ही घटित होगा (मानसून के संबंध में) और धोबी को कुंए के पानी से कपड़े धोने पड़ सकते हैं।) 

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पहिले पानि नदी उफनायँ।
तौ जानियो कि बरखा नायँ।।

(पहली बरसात से यदि नदी में बाढ़ आ जाए जो समझ लेना चाहिए कि बारिश कम होगी)

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माघ में गरमी जेठ में जाड़।
कहैं घाघ हम होब उजाड़।।

(माघ महीने में गर्मी और जेठ के महीने में जाड़ा पड़े तो समझ लेना चाहिए कि पानी के
कम बरसने से सब उजाड़ हो जाऐंगे।।)

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साँझे धनुक सकारे मोरा।
यह दोनों पानी के बौरा।।

(यदि शाम को इंद्रधनुष और सुबह मोर बोले तो
समझा लो कि बरसात हो सकती है।)

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रात निबद्दर दिन को घटा।
घाघ कहैं ये बरखा हटा।।

(रात को बादल न हों और दिन में काली घटाऐं हों तो समझ लेना
चाहिए कि मानसून काल समाप्त होगया है।)

      'घाघ' ने कतिपय कहावतें स्वास्थ्य को दृष्टिगत करते हुये भी कहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वास्थ्य को लेकर कहीं गयी उनकी बातें व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित थीं, परंतु इसकी अभिव्यक्ति भी ठेठ रोचक तरीके से की गई है। वर्ष के हर महीने में कौन से खाद्य साम्रगी का सेवन वर्जित व स्वास्थ्य के प्रति हानिकारक है, इसका विवरण घाघ ने कुछ यों दिया है -

चैते गुड़ वैशाखे तेल, जेठ क पंथ असाढ़ क बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला कातिक मही।।
अगहन जीरा, पूसे धना, माघै मिश्री, फागुन चना।।

(चैत्र माह में गुड़, वैशाख में तेल, जेठ में राह, आसाढ़ में बेल, सावन में हरी साग,
भादों में दही, क्वार में करेला, कार्तिक में मट्ठा, अगहन में जीरा, पूस में धना,
 माघ में मिश्री व फागुन में चने का सेवन नहीं करना चाहिए।)
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 जिसको मारन चाहिये, बिन लाठी बिन घाव।
                              ताको दीजो यही सलाह, घुइयां - पूड़ी खाओ।।

(जिसको बिना लाठी और चोट के मारना हो तो उसे घुइयां और पूड़ी खाने की सलाह देनी चाहिए।)

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सावन घोड़ी भादों गाय, माघ मास जो भैंस बिआय।
कहैं घाघ यह सांची बात, आपै मरै कि मलिकै खात।।

(सावन में घोड़ी, भादों में गाय और माघ महीने में भैस के द्वारा बच्चा पैदा करने से या
तो वह स्वयं मर जायेगी या मालिक का जीवन संकट में डाल देगी।)

      'घाघ' ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सिर्फ व्यंग्य ही नहीं किया है वरन कतिपय रचनाओं में उन्होंने सादगीपूर्ण जीवनशैली पर भी विचार व्यक्त किये हैं। अधोलिखित रचना सिर्फ यही बयान नहीं करती कि घाघ ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि से संबंधित थे वरन उनके जीवन दर्शन की झलक भी देती है -

भुइयाँ खेड़े हर है चार, घर है गिरिथिन औ गऊ दुधार।
अरहर की दाल जड़हन का भात, गागल निंबुआ औ घिव तात।।
खांड दही जो घर में होय, बाँके नैन परोसै जोय।
कहें घाघ तब सबही झूँठा, उहाँ छाड़ि इहवें बैकुँठा।।

(खेत गाँव के नजदीक हो, चार हल की खेती हो, घर में गृहस्थिन नारी हो, दूध देने वाली गाय हो, अरहर की दाल हो, जाड़े में पैदा होने वाला भात हो, रसदार नीबू और घी हो, घर ही में दुग्ध उत्पाद, शक्कर और दही हो, सुंदर नयनों वाली स्त्री भोजन परोसे तो घाघ कहते है कि बाकी सब इसके आगे झूठ है और स्वर्ग कहीं और नहीं, यहीं है।)

      'घाघ' की ऐसी ही सैकड़ों रचनाये हैं जो समय के साथ विस्मृत होती जा रही हैं। इसमें आश्चर्य नहीं कि एकाध पीढ़ी बाद लोग "घाघ" का नाम ही न जानें। लोककवियों एवं उनकी धरोहर के प्रति हमारी उपेक्षा के  फलस्वरूप आज यह स्थिति है कि जहाँ हम "घाघ" जैसे लोककवियों को विस्मृत करते जा रहे हैं वहीं कतिपय आधुनिक रचनाकार उनकी रचनाओं को अनुदित करके पश्चिमी साहित्य जगत में नाम कमा रहे हैं। कुछ दिन पूर्व दैनिक अमर उजाला के साप्ताहिक साहित्यिक खंड "आखर" में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर श्री अरविंद कृष्ण मेहरोत्रा की ये दो कवितायें (शायद मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गयी हैं) प्रकाशित हुईं थीं -

 पांवो में चुभते जूते, एक बदजुबान पत्नी,
पहले पैदा होने वाली लड़की।
एक बंजर जमीन, एक मूर्ख भाई,
ये अंतहीन दुःख का कारण बनते हैं ।।
****

एक खर्चीला बेटा, एक तिरछी आंखों वाली भैंस।
एक बदमिजाज बैल, इनसे तत्काल छुटकारा पा लें ।।

      इन कविताओं को पढ़कर सहज ही यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनकी प्रेरणा तथा विषयवस्तु  "घाघ" की उन दो रचनाओं से ली गई है, जिनका जिक्र इस लेख के प्रारंभ में किया गया है। संभवतः यूरोप के पाठकों को यह पता ही नहीं होगा कि भारत में शताब्दियों पहले 'घाघ' जैसे कई अन्य मूर्धन्य कवि ऐसी हजारों कवितायें/ दोहे व छंद कह गये हैं, जो आज भी कहावतों के रूप में प्रचलित हैं। पर कब तक.......



( डॉ. परितोष मालवीय )
17/07/2011, ग्वालियर

Saturday, 11 June 2011

"लेडीज़ फर्स्ट"


कार्यक्रम भले ही मुख्य अतिथि के आगमन के इंतजार में प्रातःकालीन सत्र से अपराह्न सत्र में तब्दील हो जाए पर जब तक दोपहर भोज की विधिवत रूप से घोषणा नहीं हो जाती, इसे प्रातःकालीन सत्र ही समझा जाता है। ऐसा प्रायः होता है कि मुख्य अतिथि देर से ही आते हैं अन्यथा यह समझा जाएगा कि उनके पास कोई और काम नहीं है। वर्तमान समय में हिंदी कविता पर क्या संकट हैं, संकट है या नहीं,  है तो कितना है, कविता पर संकट है या कवि पर संकट है, इत्यादि विषयों पर विचार मंथन बनाम माथापच्ची के लिए हमारे नगर में साहित्यकारों और कवियों का जमावड़ा हुआ। हालाकि मैं अपने को श्रोता मानकर इस सम्मेलन में पहुँचा था पर वहां प्रस्तुत कुछ गद्यनुमा कविताओं को सुनकर लगा कि मैं भी कवि बन सकता हूँ। आखिर जिस तरह मैं अपनी पत्नी को खाने में नमक कम या ज्यादा हो जाने पर, खाना कम या ज्यादा बन जाने पर,  जल्दी या देर से बनने पर जिन शब्दों एवं वाक्यों में झिड़कता रहता हूँ, उसे भी मुक्त छंद कविता कहा जा सकता है।

            काव्यपाठ सत्र की समाप्ति के बाद कविता पर चर्चा और समीक्षा का दौर शुरू हुआ ही था कि एक नीली गंदी जीन्स पर बिना प्रेस किया हुआ खादी का कुर्ता यानि वामपंथी गणवेश पहने एक कवि ने बिंदी से लेकर पैर की नेलपॉलिश तक लगभग एक ही रंग में मेकअप करके पधारीं एक उदीयमान कवयित्री की कविता पर व्यंग्य मारते हुए कहा कि यदि यही कविता है तो अखबार में छपे समाचार भी मुक्तछंद की रचना कहे जा सकते हैं और गोदान तो प्रेमचंद का सबसे महत्त्वपूर्ण महाकाव्य माना जाएगा।

            तिलमिला गईं कवयित्री जी ने उपहास उड़ता देख तुरंत "स्त्री विमर्श" नामक ब्रह्मस्त्र  का प्रयोग किया और कहा "छद्म प्रगतिशील ही ऐसा कह सकता है। दरअसल स्त्रियों को आगे बढ़ता हुआ देखना पुरुषों को कब भाया है? तभी तो आजतक कोई भी बढ़ा साहत्यिक सम्मान स्त्री को नहीं मिला है। और यदि मिल भी जाये तो लोग कहते हैं कि यह किसी पुरुष की विशेष कृपा या अनुराग का परिणाम है।"
           
            कार्यक्रम आयोजक ने माहौल को गर्म होते देख बीचबचाव करते हुए कहा - "यह सत्र निजी टीका - टिप्पणी के लिए नहीं है। हम कवि को स्त्री और पुरुष में नहीं बांटते।  यहाँ कवियों को आमंत्रण उनकी कविता के आधार पर दिया गया है न कि महिला - पुरुष के नाम पर। अगर हम पुरस्कार देते समय यह देखने लग गए कि अमुक स्त्री है या पुरुष, अगड़ा है या पिछड़ा,  सवर्ण है या दलित, सरयुपारीन है या कान्यकुब्ज तो हो चुका साहित्य सम्मेलन।"

            मामला जैसे - तैसे शांत ही हुआ था कि बगल के कमरे से भोजन के तैयार हो जाने का संकेत प्राप्त हो गया। पर मुख्य अतिथि का उबाऊ भाषण अभी शुरू ही हुआ था। सभी उपस्थित प्रतिभागी चाहकर भी वहाँ से उठ नहीं पा रहे थे। एक तो वैसे ही कार्यक्रम देर से शुरू हुआ था,  ऊपर से भोजन की सुगंध से बढ़ती हुई भूख। मुख्य अतिथि बड़े साहित्यकार थे अतः उनके भाषण का लंबा होना तय था। लेकिन यह भी स्थापित तथ्य है कि पकी उम्र के होने के कारण उनकी भोजन में रुचि श्रोताओं की तुलना में कम ही थी। कुछ देर तक तो उनके पांडित्य को बर्दाश्त किया गया पर जब ऐसा लगने लगा कि भोजन ठंडा हो रहा है तो कवियों में बेचैनी फैल गई। कोई अपनी कलाई पर लगी घड़ी देख कर इशारा कर रहा था तो कोई अपना थैला बंद कर रहा था। कुछ लोग उन्हें मन ही मन बूढ़ा, खूसट इत्यादि विशेषणों से नवाजने भी लग गए थे। मुख्य अतिथि को चुप होते न देख सब ने मिलकर ताली बजा दी। आखिर मेहनत रंग लाई तथा भाषण समाप्त हुआ।

            जल्दी से धन्यवाद प्रस्ताव देकर सभी कवि भोजन कक्ष में प्रवेश कर गये। उदीयमान कवयित्री भी पीछे नहीं थीं। खाने के लिए प्लेट उठाते समय आयोजक महोदय ने उनकी ओर प्लेट बढ़ाते हुये कहा - "लेडीज़ फर्स्ट" । मैडम ने खींसे निपोरते हुए प्लेट थाम ली। साहित्यिक सम्मान न सही,  खाने की पहली प्लेट पर तो स्त्री का हक़ पुनः स्थापित हुआ।

Saturday, 4 June 2011

वर्तमान ग़ज़ल में पर्यावरण असंतुलन की अभिव्यक्ति



ग़ज़ल, वर्तमान समय की अत्यंत लोकप्रिय विधा एवं भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। हिंदी भाषा में भी ग़ज़ल की सुदीर्घ परंपरा रही है। स्वातंत्र्योत्तर काल में आधुनिक हिंदी ग़ज़ल की भावभूमि में व्यापक परिवर्तन हुये हैं। आधुनिक काल में ग़ज़ल से तात्पर्य केवल रूमानियत, शराब, प्रेमी-प्रेमिका के आख्यान आदि कदापि नहीं है। आज की ग़ज़ल आज के मुद्दों को उठा रही है, ठीक उसी तरह जैसे साहित्य की अन्य विधाओं में होता है। आज का रचनाकार ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर पैनी नज़र रखता है।
     
        आज के परिवेश में उपजे कुछ ऐसे पहलुओं सवालों की अभिव्यक्ति वर्तमान ग़ज़ल में व्यापक रूप से मिलती है जो इससे पूर्व कभी अभिव्यक्त नहीं हुए। दरअसल ऐसे मुद्दे सिर्फ आज की सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियों के कारण ही उत्पन्न हुये है जैसे - पर्यावरण पतन, भूमंडलीय तापन या ग्लोबल वार्मिंग, औद्योगीकरण का संकट, बिखरते परिवार मानवमूल्य, भूमंडलीयकरण, कृत्रिमतापूर्ण जीवन शैली, उपभोक्तावाद आदि।

        हिंदी ग़ज़ल को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने का क्रांतिकारी कार्य का सूत्रपात संभवतः दुष्यंत कुमार ने ही किया। दुष्यंत कुमार के बाद तो जैसे हिंदी ग़ज़ल को एक नई दिशा एवं ऊर्जा मिल गयी। उनके परवर्ती काल में कई ग़ज़लकारों ने उन्हीं के स्वर में ग़ज़ल कहना शुरू किया। दुष्यंत के बाद हिंदी ग़ज़ल परंपरा में शंभुनाथ सिंह, नरेन्द्र वशिष्ठ, भवानी शंकर, चंद्रसेन विराट, शेरजंग गर्ग, कुंअर बेचैन, नित्यानंद तुषार, ज़हीर कुरैशी, डॉ. सूर्यभानु गुप्त, गिरिराजशरण अग्रवाल, राजेश रेड्डी, विज्ञान व्रत, तुफैल चतुर्वेदी, डॉ. उर्मिलेश जैसे ग़ज़लकारों के अलावा बशीर बद्र और निदा फाज़ली जैसे उर्दू लहज़े के शायरों का नाम लिया जा सकता है। तात्पर्य यह है कि शायद ही कोई ऐसा ग़ज़लकार हो जो अपनी ग़ज़ल में सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्त नहीं करता हो।
     
      चूंकि पर्यावरण प्रदूषण एवं पतन की विकराल समस्या अभी कुछ ही दशक पुरानी है अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि सिर्फ वर्तमान ग़ज़ल में ही पर्यावरण प्रदूषण, पारिस्थतिकी असंतुलन पतन आदि की अभिव्यक्ति हुई है, कुछ दशक पूर्व की ग़ज़लों में नहीं। पर्यावरण प्रदूषण के अंतर्गत जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, पारिस्थितिकी असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग इत्यादि आते हैं। वर्तमान ग़ज़लकार ने विस्तार से लगभग इन सभी पहलुओं को छुआ है। जल प्रदूषण की विभीषिका को रेखांकित करते हुए कुछ शे दृष्टव्य हैं -  

किस तरह प्यासा नदी के पास जाये बोलिए,
जब वहाँ पर हो रहा है ज़हर घोली का समां

- उपेन्द्र प्रसाद सिंह
*****

नदी जिसका पानी था अमृत के जैसा, जाने वो विष कौन सा पी रही है।
हरेक सिम्त हैं नागफनियों के मंजर, ये कैसा चमन है, ये कैसी सदी है।

- मिथलेश गहमरी
*****

पीना होगा और गरल, जीना इतना नहीं सरल,
कीचड़ हाथों में भर आता, कहाँ गया वह गंगाजल।
- नवीन निकुंज
    
     वायु प्रदूषण की समस्या मनुष्य के स्वास्थ्य पर निरंतर विपरीत प्रभाव डाल रही है, अब यह तथ्य नया नहीं रह गया है। वर्तमान ग़ज़लकार ने इस समस्या को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है -

साथ समय के सदा चलो, हर एक तरफ इशारे हैं,
ज़हर हवा में फैल रहा, पेड़-पेड़ पर आरे हैं।
- अशोक गीते

*****

भागदौड़ की एक कहानी चलती है दिनभर
तारकोल की सड़क धूप में जलती है दिनभर
हवा शहर की इसीलिए बीमार हो रही है
मिल की चिमनी काला ज़हर उगलती है दिनभर
- ज़हीर कुरेशी

      पर्यावरणविद एवं विचारक श्री विनोद चंद्र पांडेय के अनुसार - पर्यावरण मानव जीवन का अभिन्न अंग है। मानव पर्यावरण का एक प्रमुख घटक है। मानव के चारों ओर उसे आवृत्त करता हुआ भौतिक जगत का जो परि आवरण है, वही पर्यावरण है। मानव के साथ - साथ विविध प्रकार की वनस्पतियाँ, जीव-जंतु तथा प्राकृतिक संपदा इसमें सम्मिलित है।
      उपर्युक्त परिभाषा पर विचार करें तो यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि पर्यावरण की बात करते समय हमें समग्रता के साथ समूचे पारिस्थितिकी तंत्र की चर्चा करनी होगी। वर्तमान ग़ज़ल में पर्यावरण प्रदूषण के समस्त प्रचलित भागों या विषयों पर लिखा गया है। ध्वनि प्रदूषण एवं मृदा प्रदूषण पर केंद्रित कुछ शे निम्नवत् हैं -


आदमी बहरा हुआ है शोर से, महफिलों को खा गईं तनहाईयाँ
हैं मशीनी सभ्यता के वन खड़े, अब कहीं गाती नहीं अमराइयाँ
- परमानंद अश्रुज

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इन हवाओं में ज़हर है दूर चलिए
ये तो बहरों का शहर है दूर चलिए
शोरगुल के जंगलों में खो गए हम
चिलचिलाती दोपहर है दूर चलिए
- संजीवन मयंक

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इस रूमाल को काम में लाओ अपनी आँखें साफ करो
मैला - मैला चाँद नहीं है, धूल जमीं है आँखों में।
   - बशीर बद्र

      परंपरागत रूप से पर्यावरण प्रदूषण से तात्पर्य जल, ध्वनि एवं वायु प्रदूषण से है। कालांतर में मृदा प्रदूषण भी इस वर्गीकरण में शामिल हुआ। लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन के फलस्वरूप हुए पर्यावरण के निरंतर असंतुलन ने विगत कुछ दशकों में इस वर्गीकरण में अम्ल वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग या भूमंडलीय तापन, ओजोन परत क्षरण आदि नए विषय भी शामिल हो गए हैं। इन अद्यतन शामिल विषयों या विभीषिकाओं ने तो मानवमात्र के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। वर्तमान समय में विश्वभर के वैज्ञानिक एवं विद्वान आपस में मिलजुलकर इस जीवनदायिनी धरती को बचाने के लिए विचार मंथन कर रहे हैं। अम्ल वर्षा, ग्लोबल वार्मिंग या भूमंडलीय तापन, ओजोन परत क्षरण जैसे आधुनिकतम विषय भी वर्तमान ग़ज़लकार की दृष्टि से ओझल नहीं हुए हैं। इन विषयों की अभिव्यक्ति ग़ज़लकारों के अद्यतन होने तथा इस विषय की गंभीरता को स्पष्ट करती है -  

थरथरा रही है जमीं, आसमां है चुप,
इक डर छिपा हुआ है निगाहों में देखिए।
बारिश में भीगने का मौसम नहीं रहा,
तेजाब भर गया है घटाओं में देखिए।
- हरि मौर्य


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ओस अब तेजाब की बूदों में ढलकर गिर रही,
फूल से चेहरे हमारे अब कहाँ जाकर खिलें।
- डॉ. उर्मिलेश


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कोई पेड़ खिले तो कैसे, फुनगी ही मर जाती है।
धुँआ उगलता ज़हर तब था, मौसम बड़ा नशीला था।
चली आरियाँ, बाग-बगीचे, खेत बनाया नाती ने
बाबा ने तो अपने हाथों, रोपा पेड़ रसीला था।
- जवाहर इंदू

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मत घोलिये आब हवा में रात दिन काला ज़हर
कि साँस भी लेना हो मुश्किल आदमी को साँस भर।
जख्मी हुई जिस रोज़ से ओजोन की मोटी परत
महसूस होती चाँदनी, हो जून की ज्यों दोपहर।
भूकंप-सूखा-बाढ़-रोगों की नई पैदाइशें
हर दिन बढ़ी आती है जानिब गाँव हो या हो शहर।
बनाते रहे मरुस्थल हरे जंगल मुसल्सल काटकर
सोचो जरा होगा हमारा हश्र क्या कुछ है खबर।
रोकी नहीं जो ग़र अभी बढ़ती मशीनीं सभ्यता
इक दिन यकीनन ढ़ाएगी सब पर कयामत का कहर।
बारूद पर बैठा हुआ इंसान जो सभ्हला तूं
हर तरफ शमशान होंगे या कि कब्रिस्तान भर।
- सत्य नारायण शर्मा

      वर्तमान ग़ज़लकार इस प्राकृतिक व्यवस्था के असंतुलन से इतना आहत है कि कहीं-कहीं उनकी ग़ज़लों में निराशावाद की अभिव्यक्ति भी हुयी है

हर नजर में एक झुलसा गुलमोहर है,
ये हमारे गाँव की ताज़ा खबर है।
- शिव ओम अंबर

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कितनों ही के सिर से साया जाता है
जब एक पीपल काट गिराया जाता है।
- ज़फ़र गोरखपुरी

      प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुध दोहन से आहत होकर आधुनिक ग़ज़लकार ने सिर्फ निराशावाद में लिपटी ग़ज़लें ही नहीं कही हैं वरन इतना सब कुछ घटने के बाद भी वे भविष्य को लेकर आशावादी हैं। मानव का सहज प्रकृति प्रेम अनुशासन पूर्ण रवैया ही वह सूत्र है जिसके द्वारा बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है। ग़ज़लों में आशावाद को दर्शाते कुछ शे -

गुजरो जो बाग से तो दुआ मांगते चले
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे।
- निदा फाज़ली
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फूल खिल सकते नहीं तो ज़ख्म ही दिल में खिलें
जैसे भी महके ये धरती, इसको महकाना तो है।
- कैफी आज़मी


      आज आवश्यकता है उस मानव समाज के निर्माण की, जो प्रकृति के साथ शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के सिद्धांत को बनाए रख सके। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया वाक्य आज के मनुष्य के लिए आदर्श हो सकता है - "हे धरती माँ! जो कुछ तुझसे लूंगा, वह उतना ही होगा जिसे तू पुनः पैदा कर सके। तेरे मर्मस्थल पर, तेरी जीवन शक्ति पर कभी आघात नहीं करूंगा।"

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                                    - डॉ. परितोष मालवीय
                        39/3 डिफेंस कॉलोनी, ग्वालियर
9425735202


संदर्भ -
1.     अंक 19, पृथ्वी और पर्यावरण, विनोद चंद्र पांडेय,
2.    ग़ज़ल दुश्यंत के बाद, सं. दीक्षित दनकौरी
3.    हिंदी ग़ज़ल का वर्तमान दशक, सं. सरदार मुजावर
4.    हिन्दी ग़ज़ल शतक, सं. शेरजंग गर्ग
5.    हिन्दुस्तानी ग़ज़लें, सं. कमलेश्वर
6.    ग़ज़ल विश्वांक, आरंभ - 02, सं. प्रदीप चौबे