Monday, 24 September 2018

आस्था का उपहास

जो आस्तिक हैं, उन्हें अपने आराध्य की अनंत क्षमताओं पर भरोसा रखना चाहिए। उनके बचाव की या उनकी ओर से धर्मयुद्ध छेड़ने की कोई जरूरत नहीं है। हाँ, अशिष्ट और मर्यादा हीन टिप्पणी पर रोक आवश्यक है। जानबूझ कर ऐसी बात न बोली जाए, जिससे कोई दुःखी हो। पर ईश्वर को लेकर इतना छुई मुई भी न हुआ जाए।
अगर ईश्वर पर प्रश्न उठाना आस्तिक की आस्था का उपहास है तो इसी तर्क के अनुसार अपनी आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन (लाउडस्पीकर, कलश यात्रा, जगह-जगह मूर्ती स्थापना, चौराहे पर बकरा या ऊँट काटना, जुलूस के नाम पर शस्त्र और शक्ति प्रदर्शन....) भी नास्तिकों और अन्य धर्माबलम्बियों को आहत करने की श्रेणी में आ सकता है।
अतएव इस विषय पर सहिष्णु होना ही एकमात्र हल है। प्रतिपक्ष की उपस्थिति को स्वीकार करें, अन्य धर्मों की पूजोपासना पद्यति/ कर्मकांडों को भी बर्दाश्त करें।


अप्रैल 2017

हनुमान जयंती - ललितपुर का "लोकपर्व"

आज हनुमान जयंती है। त्योहारों से जुड़ी बचपन की यादों में यह दिन बार-बार याद आता है। बचपन में पिताजी सुबह से ही हनुमान जयंती के जुलूस में शामिल लोगों को शीतल जल पिलाने की व्यवस्था में लगे रहते थे। पानी की टंकी को साफ़ करना, केवड़ा और बर्फ डालकर जल को पीने योग्य बनाना....इत्यादि।
मुझे भी शाम का इंतज़ार रहता। मेरे लिए आकर्षण का केंद्र पानी की टंकी चौराहे पर होने वाली युद्ध कलाओं का प्रदर्शन रहता। मेरा यह भी अनुभव रहा है कि जुलूस में शामिल लोगों का उत्साह पानी की टंकी चौराहे पर सबसे ज्यादा तीव्र और मुखर हुआ करता था। चौराहे पर ही स्थित मेरे घर की छत पर सैकड़ो लोगों का जमावड़ा होता । किशोरावस्था तक आते-आते मैं भी पिताजी के साथ सबको पानी पिलाता। मुझे अच्छी तरह से याद है कि उस समय शीतल जल के इतने पंडाल नहीं लगा करते थे। फिर धीरे-धीरे जब हर दस कदम पर पंडालों में शर्बत परोसा जाने लगा तो पिताजी ने जल पिलाने की व्यवस्था बंद कर दी और ये ठीक भी है। जिस कार्य को समाज अपना ले, तो अपना मंतव्य पूरा हो जाता है।
आज फेसबुक मित्र Dharmendra Goswami जी ने अपनी वॉल पर इसे ललितपुर का "लोकपर्व" कहा है। निस्संदेह यह पर्व ललितपुर का लोक पर्व है। जिस तरह ललितपुर का जनसमुदाय तुवन मंदिर के प्रति अगाध श्रद्धा रखता है और इस जुलूस में शामिल होता है, वह बात इसे ललितपुर का लोकपर्व ही बनाती है। और यह बात ललितपुर से बाहर रहकर ज्यादा अच्छे से समझ आती है।

April 2017

तेज़ी से बहरे होते जा रहे समाज

हम तेज़ी से बहरे होते जा रहे समाज हैं :-
मुझे पिछले कुछ वर्षों से Tinitus है। ये वह बीमारी या अवस्था है जिसमें दिन - रात कानों में घंटी सी बजती रहती है। ठीक उसी तरह जैसे आपके पास पटाखा चल जाने के बाद कुछ देर तक चूँ...... की आवाज़ होती है। डॉक्टरों के अनुसार ये आगे चलकर बहरे होने का सूचक है।
मुझे सबसे पहले इसका पता लगभग 04 साल पहले उस समय चला था जब मैं अपने ऑफिस के शांत कमरे में बैठा था। काफी देर तक मुझे जब चूँ.... की आवाज़ सुनाई देती रही तो मैं इसे यूपीएस से आती आवाज़ समझता रहा। कुछ ही मिनटों बाद मुझे समझ आ गया कि ये आवाज़ कहीं और से नहीं बल्कि मेरे दायें कान से आ रही है। मैंने अपने कान के चिकित्सक मित्र Dranupam Mishra से संपर्क किया। उन्होंने बताया कि ये tinitus है और ये लगभग लाइलाज बीमारी है। उन्होंने मुझे इसे बर्दाश्त करने के कुछ तरीके बताये। मेरे पूछने पर ही बताया कि इसका कारण दवाओं का दुष्प्रभाव और तेज़ ध्वनि प्रदूषण हो सकता है। मुझे जाड़े की रातों में बहुत परेशानी होती है। इसके अलावा तेज़ ध्वनि में कान के परदे हिलने लगते हैं।
मेरा घर ललितपुर में बीच चौराहे पर है जो लंबे अरसे तक हाईवे भी था। दिन रात ट्रकों और वाहनों की चिल्ल-पो झेलना हमारे लिए सामान्य बात थी। रही-सही कसर सामने स्थित जरीना मोर सजावट बैंड ने पूरी कर दी जो गाहे-बगाहे अपने बैंड और डीजे का परीक्षण किया करते थे। उनकी कृपा से अल्ताफ रज़ा के कई गाने मुझे पूरे याद हो गए थे। मैं यदि ये लिखूँ कि धार्मिक उत्सवों पर चोरी की बिजली से बजने वाले लाउड स्पीकर का भी मेरे tinitus में पर्याप्त योगदान है तो इसमें अतिशयोक्ति न होगी।
अब भी मुझे ग्वालियर में सुबह शाम ऑफिस आते - जाते समय पड़ाव पुल से गुजरना पड़ता है जहाँ ध्वनि प्रदूषण मुझे बहुत परेशान करता है। शायद किसी अन्य तरह के प्रदूषण से ज्यादा। मेरे साथ चलने वाले लोग प्रायः ये शिकायत करते हैं कि मैं सड़क पर ड्राइविंग करते समय आवेशित और आक्रोशित रहता हूँ। प्रायः झगड़ता रहता हूँ। गाली देता और सुनता रहता हूँ।
मैं ये सब इसलिये लिख रहा हूँ क्योंकि मैं एक ऐसा समाज चाहता हूँ जिसमें अनावश्यक शोर न हो। सुना है सभ्य और विकसित पश्चिमी देशों में लोग बेवजह हॉर्न नहीं बजाते। पिछले साल अपने पडोसी मुल्क भूटान की यात्रा के दौरान मैंने स्वयं वहां के निवासियों की सभ्यता का अनुभव किया था। वहां के ड्राईवर भी हॉर्न सिर्फ बेहद आवश्यक होने पर ही बजाते हैं। मेरा दुःख ये है कि हमारे देश में दूर-दूर तक ये सम्भावना नज़र नहीं आती। हालात यहाँ तक बदतर हैं कि मैंने रेल के ड्राईवर को भी प्लेटफार्म पर पटरी पार कर अपनी जान जोखिम में डाल रहे लोगों को हटाने के लिए हॉर्न बजाते प्रायः देखा है।
हम चिल्ल-पों पसंद समाज हैं और दिनोदिन बहरे होते जा रहे हैं।

June 2017

हरितालिका व्रत कथा

मैं पिछले कई साल से तीज़ और करवाचौथ जैसे पितृसत्तात्मक और असमानतावादी त्योहारों के खिलाफ लिखता रहा हूँ।
घर पर आज भी तीज़ का त्यौहार मना। मैंने दिये जलाये, और छोटी सी झांकी सजाने में अपना योगदान दिया। बढ़िया पकवान बने थे मेरे सेवन को। यहाँ तक तो सब ठीक है। उसके बाद बारी आई मेरे कथा बांचने की। बस यहीं पर सारा जायका खराब हो गया। हरितालिका व्रत कथा नाम से जो किताब बाजार में बिकती है, उसका प्रिंट तो खराब है ही, उसमे लिखी और छपी कथा भी बेहद दोयम दर्ज़े की और तथ्य दोषपूर्ण है।
सोच रहा हूँ इसी कथा को कुछ सुधार करके ठीक हिंदी में लिख दूँ। थोडा सा कल्पना का समावेश करके अच्छी सी कथा बन सकती है। किसी के पास इस कथा का प्राचीन संस्करण है क्या?
जो बिक रहा है वो किसी लालची पंडे में लिखा है। उसे न जाने कहा से बर्फ से ढँके कैलाश पर्वत पर बरगद के पेड़ की छाँव मिल गयी। ऐसी ही न जाने कितनी बातें........ खीज में सर भन्ना रहा है।

Sep. 2017

"नानी के हाउस" जा रहे हैं।

राजधानी एक्सप्रेस के AC-2 डिब्बे में सामने की सीट पर एक युगल अपने 05-06 साल के पुत्र के साथ बैठा है। बातचीत, पोशाक और खाद्यान्न आदतों से किसी मल्टीनेशनल में कार्यरत युगल लगता है। राजधानी एक्सप्रेस में सफ़र करने के बावजूद "मैक डी" से बर्गर वगैरह पैक करा के चले हैं।
उनकी बातचीत से समझ आ रहा है कि वे बच्चे की "नानी के हाउस" जा रहे हैं। बच्चा भयानक हाइपर है। इतना हाइपर कि आधा कम्पार्टमेंट सिर पर उठाये हुए है। बात-बात में लोट जाता है और ओह माय गॉड करते हुए जोर-जोर से चीखने लगता है
सुशिक्षित माता-पिता शिष्टाचारवश शरमाये जा रहे हैं।
01 घंटे तक उस बच्चे ने अपने पर्सनल टैब पर तरह - तरह के वीडियो देखे हैं। बताने की जरूरत नहीं कि वीडियो के गीत का आनंद हम सहयात्रियों को भी मिला है।
फ़िलहाल वह ज़मीन पर लोट गया है और टमाटो सूप टीशर्ट पर मल लिया है। कह रहा है कि ट्रेन खड़ी क्यों हो गयी है।
अरे भाई कोई जल्दी से सिग्नल हरा करवाओ। उसके माता-पिता के साथ आधे डिब्बे के यात्रियों की यही मांग है।
बाकी आधा डिब्बा फ्लेक्सी फेयर के कारण खाली है।

August 2017

करवाचौथ की मुबारकवाद

इधर कुछ दिनों से एक बात बार-बार महसूस हो रही है कि फेसबुक पर लिखने का कोई लाभ नहीं है। हम समय के उस दौर में आ पहुंचे हैं, जहाँ हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा अपने आप को जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर समझ बैठा है। आप चाहे जितनी तथ्यात्मक या तार्किक बात लिखो, उन्हें आपकी बात फूटी आँख नहीं सुहाती।
यहाँ तक कि उनकी नज़रों में आपकी निजी मान्यताओं और विचार प्रक्रिया का भी कोई स्थान नहीं है। ज्यादा साफ़-साफ़ लिखने की कोशिश करो तो तत्काल समाज विरोधी, धर्म विरोधी और राष्ट्र विरोधी होने का तमगा तैयार है
पिछले साल तक मैं करवाचौथ जैसे नितांत मर्दवादी त्यौहार के खिलाफ आराम से लिखा करता था। मेरी नज़र में ये त्यौहार स्त्री को हीन और पुरुष को देवता के पद पर ला बैठाता है। पर इस वर्ष मैं ऐसी कोई देशद्रोही टाइप बात नहीं लिखूंगा।
तो भारत देश की समस्त नारियों को करवाचौथ की मुबारकवाद। दिन भर भूखी रहो पर घर भर के लिए पकवान बनाओ। घर की साफ़ सफाई भी रोज़ की तुलना में ज्यादा करो। दोपहर तक काम निपट जाए तो घर के आँगन या दरवाज़े पर रंगोली बनाओ। शाम से ही सजना शुरू कर दो ताकि पूजा के समय तक रात का खाना भी बन जाए। उसके बाद करवाचौथ की महान संस्कारी कथा सुनो। ऐसी कथाओं में ही तो हमारी संस्कृति का सार छुपा है। रात को चाँद के निकलने पर ही जल ग्रहण करना। चाहो तो करण जौहर की फिल्मों से आईडिया ले सकती हो। पूजा निपटा कर बैडरूम में टीवी का रिमोट हाथ में लेकर पसरे हुए पति परमेश्वर के पैर छू लो। आखिर तुम्हारा सब कुछ इन्हीं चरणों में ही तो है।


 Sep. 2017

Film- secret superstar

मेरे बी.ए. के पाठ्यक्रम में हेनरी इब्सन का बहुत प्रसिद्द नाटक "A doll's house" था, जिसके अंत में उसकी प्रमुख पात्र "नोरा" अपने पति के घर को छोड़ देती है और बाहर जाते समय दरवाज़े को जोर से बंद करते हुए चली जाती है। 1870 में यह नाटक डेनमार्क में मंचित हुआ था और उस समय इसे महिला सशक्तिकरण विषय पर एक क्रांतिकारी हस्तक्षेप माना गया था। यह दुर्भाग्य ही है कि लगभग 150 साल गुजर जाने के बाद भी लाखों - करोड़ों महिलाओं के लिए आज भी यह नाटक प्रासंगिक है।
कल रिलीज़ हुई आमिर खान की फ़िल्म secret superstar बहुत बारीक़ी से कई विषयों को छूती है। फ़िल्म की एक प्रमुख पात्र जब अपने पति के हाथ में तलाक़ के कागज़ रख देती है, तो वह इब्सन की नोरा ही नज़र आती है। और फ़िल्म के अंत में जब इसकी 15 वर्षीय मुख्य पात्र अपने बुरखे को उतार फेंकती है, तो उसका सन्देश बहुत गहरा और स्पष्ट है।
जानता हूँ कि सिर्फ बुरखा उतार फेकना ही क्रांति नहीं है, लेकिन फिर भी ये एक बड़ा प्रतीक है। महिलाओं , विशेषकर मुस्लिम महिलाओं का पुरुष नियंत्रित जीवन किसी से छुपा नहीं है, ऐसे में आमिर खान ने बेहद साहस के साथ उस बात को सिनेमा की भाषा में कहा है जिसे लोग कहने और लिखने से बचते हैं। धर्म, परंपरा, मर्यादा, लज़्ज़ा नामक बेड़ियां प्रायः महिला के पैरों में ही दिखाई देती है। यह फ़िल्म हमें जहाँ एक ओर ये बताती है कि उन बेडियों को कैसे तोडना है, वही दूसरी ओर यह भी बताती है कि भविष्य के बच्चे कैसे होंगे।
सभी सिनेप्रेमी मित्र आमिर खान की इस फ़िल्म को जरूर देखें, और वे भी देखें जो आमिर के कुछ अलग कारणों से आलोचक रहे हैं।

Oct. 2017