Monday, 24 September 2018

नैतिकता और संस्कार की घुट्टी

समाज सुधार के हमारे अब तक के प्रयास महिलाओं - लड़कियों की आचार संहिता तक करने तक सीमित रहे हैं। हर घटना के बाद यही नसीहत दी जाती है कि लड़की को ऐसा नहीं करना था-वैसा नहीं करना था - यहाँ नहीं जाना था - ऐसे कपडे नहीं पहनने थे- लज्जा महिलाओं का गहना है - ब्ला - ब्ला …....
....पर इसका कोई ज्यादा लाभ दिखाई नहीं दिया है। निर्भया के बाद भी घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। दुधमुंही बच्चियों के साथ बलात्कार की न जाने कितनी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। 02 दिन पहले किसी विकृत मानसिकता ने 100 वर्ष की बुजुर्ग महिला के साथ बलात्कार कर दिया। और राह चलती लड़कियों को घूरती आँखे हमारी राष्ट्रीय सभ्यता बन गयी है।
नैतिकता और संस्कार की घुट्टी हमारे समाज पर अब प्रतिरोधी (resistant) हो गयी है। न ही हमारा स्वर्णिम भूतकाल, न ही धार्मिक आख्यान और न ही नैतिक उपदेश काम आ रहे हैं।
हमें इस स्थिति में सुधार लाने के लिए अपने उपचार की पद्यति को बदलना होगा। हमें अपने लड़कों को सुशिक्षित और संस्कारित करना पड़ेगा कि उन्हें स्त्रियों से कैसे पेश आना चाहिए। जिस तरह हमारी माएँ लड़कियों को ससुराल के लिए मानसिक रूप से तैयार करती हैं, उसी तरह लड़कों को भी प्रशिक्षित करने पर कुछ बेहतर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।.......

Nov. 2017

पदमावती राष्ट्रमाता

अरे यार, कंफ्यूज नहीं करो!
अब कह रहे हो कि पदमावती राष्ट्रमाता हैं।
लगे हाथ ये भी बता दो कि राष्ट्र बहिन, राष्ट्र बुआ, राष्ट्र मामी, राष्ट्र चाची, राष्ट्र सास, राष्ट्र ताऊ,राष्ट्र चाचा, राष्ट्र मामा, राष्ट्र ससुर, राष्ट्र गुरु, राष्ट्र गुरुमाता कौन है!
राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुए आवश्यकतानुसार राष्ट्र चमचा, राष्ट्र बखलोल, राष्ट्र चिरकुट भी घोषित किये जा सकते हैं।
बेहतर होगा कि यह अत्यावश्यक काम संसद का विशेष सत्र बुलाकर कर लिया जाए। राष्ट्र निर्माण की दिशा में यह सबसे बड़ा काम साबित होगा।

क्रिश्मस का विरोध या मानसिक दीवालियापन?

क्रिश्मस का विरोध या मानसिक दीवालियापन? -----

मनुष्य चाहे तो उसका विस्तार अंतरिक्ष सा हो सकता है। गौतम बुद्ध, विवेकानंद, गाँधी, ......... जैसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है हमारे देश में।
उसी के विलोम में क्षुद्रता की भी कोई सीमा नहीं है। ये पतन इस सीमा तक हो सकता है कि अपने आप में नाभिकीय बिखण्डन का सिद्धांत शरमा जाए। संकुचित व्यक्ति सिर्फ राष्ट्र, धर्म, जाति, कुटुंब, परिवार की सीमा तक ही सीमित नहीं रहता। वह उससे भी नीचे जाकर अंततः नितांत स्वार्थी ही साबित होता है।
जो आज हिन्दू के संगठित होने की चिंता में घुले जा रहे हैं, वे मौका मिलते ही अव्वल दर्ज़े के जातिवादी भी साबित होते हैं और चुनाव के वक़्त अपनी जाति के लफंगे, दुष्ट, लोभी, भ्रस्टाचारी को भी वोट दे आते हैं। ऐसा करते समय न तो उन्हें अपने राष्ट्र की चिंता सताती है न धर्म की....
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को एक रंग में रंगने का स्वप्न ही देशद्रोह है।

Monday, 13 July 2015

भीड़ में शामि‍ल आदमी

हर धार्मिक प्रदर्शन/आचरण, जो सार्वजनि‍क रूप से कि‍या जाये, आमतौर पर नागरि‍क बोध एवं शि‍ष्‍टता के प्रति‍कूल ही होता है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में तो ये आक्रामक भी होता है। आखि‍र और क्‍या वजह है धार्मिक जुलूसों के दौरान दंगे भड़कने की।
मैंने अपने छोटे से शहर ललि‍तपुर में ये देखा है कि‍ बाराबफात और हनुमान जयंती के जुलूस में हथि‍यारों और युद्ध - कलाओं / करतबों का प्रदर्शन दूसरे धर्माबलंबि‍यों को धमकाने के लि‍ए ही होता है या ये दर्शाने के लि‍ए कि‍ देखो हम भी तलवार उठा सकते हैं और मौका पड़ने पर सर कलम भी कर सकते हैं। ऐसे जुलूसों में ध्‍वनि‍ वि‍स्‍तारकों द्वारा होने वाले ध्‍वनि‍ प्रदूषण, आति‍शबाजी द्वारा होने वाला वायु प्रदूषण और मूर्तियां/ ताजि‍ये वि‍सर्जन से होने वाला जल प्रदूषण समूची मानवता पर बोझ है। हमारी स्‍थि‍ति‍ उस कालिदास की तरह है जो अपनी ही शाख काट रहा है।
आमतौर पर ये मानकर चला जाता है कि‍ धार्मिक कार्यक्रम / अनुष्‍ठान के लि‍ए कि‍सी भी तरह की प्रशासनि‍क अनुमति‍ आवश्‍यक नहीं है क्‍योंकि‍ इससे बहुसंख्‍यक आबादी की धार्मिक भावना जो जुड़ी है। मुट्ठीभर नास्‍ति‍कों या ऐसे नागरि‍क जो इस आक्रामक संस्‍कृति‍ के खि‍लाफ हैं, की भावना की कि‍सी को परवाह नहीं होती।
ये भी देखा है कि‍ हम एक - दूसरे की बुरी बातों को बहुत जल्‍द अपना लेते हैं जबकि‍ अच्‍छी आदतों को देर से । इसका कारण शायद यही है कि‍ बुरे काम मेहनत तलब नहीं होते। प्राय: आक्रामकता की होड़ सी मच जाती है। उस भीड़ में शामि‍ल सभ्‍य आदमी का आचरण भी उन्‍मादी ही हो जाता है। ये मनोवैज्ञानि‍क पहलू है। भीड़ में शामि‍ल आदमी अपनी पहचान ही नहीं खोता, अपने होशोहवास भी खो देता है।

Tuesday, 16 June 2015

वि‍हान

यद्यपि‍ फेसबुक पर अंतर्तम भावनाओं की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ मुझे प्राय: बनावटी और व्‍यक्‍ति‍गत लगती है लेकि‍न फि‍र भी तुम्‍हारे 9वें जन्‍मदि‍न पर कुछ पंक्‍ति‍यां तो बनती ही हैं। ..............
तुम्हें बड़े होते देखना एक अद्भुत एहसास है। देख पा रहा हूं कि‍ अपने बचपन में मैं भी तुम्‍हारी तरह क्रि‍केट का दीवाना हुआ करता था, तुम्‍हारी ही तरह दि‍न-रात मेरे दि‍माग में लैग स्‍पि‍न, ऑफ स्‍पि‍न, चौका-छक्‍का घूमता रहता था, तुम्‍हारी ही तरह भावुक और शर्मीला हुआ करता था, तुम्‍हारी ही तरह मुझे नाचना पसंद नहीं था, .................देख पा रहा हूं कि‍ तुम मेरे ही जैसे हो।
तुम्‍हारी कई वि‍शेषतायें मुझे अपने बचपन में ले जाती हैं। तुम्‍हारे माध्‍यम से ही मैं अपने बचपन को पूर्ण कर रहा हूं। शायद कुछ दि‍न बाद तुम समझ सको कि‍ आखि‍र क्‍यों मैं तुम्‍हारे 5वें जन्‍मदि‍न पर रेलगाड़ी लाया था और आखि‍र क्‍यों तुम्‍हारे पास क्रि‍केट से जुड़ी सामग्रि‍यों की कोई कमी नहीं है।....................
शायद तुम्‍हें याद रह पाये (न भी रहे तो कोई बात नहीं) कि‍ आखि‍र क्‍यों मैं तुम्‍हें हर उस गति‍वि‍धि‍ में लि‍प्‍त होने देता हूं जो तुम्‍हें बेहद पसंद हैं। ताकि‍ तुम्‍हारे मन में अपने बचपन को लेकर कोई कसक न रह पाये। यद्यपि‍ मुझे भी अपने बचपन से कोई शि‍कायत नहीं है पर उस दौर में आज की तरह चाइनीज़ खि‍लौने और मोबाइल गेम मौजूद नहीं थे। मुझे याद है कि‍ मुझे उस समय बहुत अच्‍छा लगता था जब तुम्‍हारे दादा मुझे साइकिल के डंडे पर तौलि‍या लपेट कर बि‍ठाते थे और बाजार ले जाते थे...................मुझे नहीं पता कि‍ तुम्‍हारे मन में कौन सी बारीक स्‍मृति‍ शेष रह जायेगी इसलि‍ए अपनी ओर से तुम्‍हारे बचपन को समृद्ध करने का प्रयास करता हूं वि‍शेषकर खेलकूद से जुडी गति‍वि‍धि‍यों को..........
जी भर के जी लो अपने बचपन को.................... खूब खेलो, खूब कूदो, पूरी कॉलोनी में दौड़ते फि‍रो............

जीवन

अब तक के अपने जीवन से कोई शि‍कायत नहीं है, पर कई बातों को न कर पाने का मलाल अवश्‍य है। बचपन में शायद ही ऐसा कोई खेल हो जो न खेला हो। परि‍पूर्ण बचपन जि‍या है इसलि‍ए कोई मलाल नहीं है बस स्‍पोर्टस कॉलेज लखनऊ में क्रि‍केटर के रूप में दाखि‍ला लेने का ख्‍वाब अधूरा रह गया। स्‍कूली जीवन में साथी छात्र/छात्राओं के साथ टूर पर न जा पाना भी खलता है ......... .... ........ .................
जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही इलाहाबाद चला गया। अनुभवों की प्रयोगशाला इलाहाबाद ने बहुत कुछ सि‍खाया। पर कई बातें हैं जो नहीं कर पाया। वि‍धि‍वत रूप से हॉस्‍टल जीवन न जी पाने का मलाल है। कई अवसर मि‍लने के बावजूद प्रेमप्रसंग न हो पाने का मलाल है। सुंदर ल्रड़कि‍यां आकर्षित तो करती थीं, पर उनसे मि‍त्रता बढ़ाने से डरता था। शायद स्‍मॉल टाउन मानसि‍कता थी और सरस्‍वती शि‍शु मंदि‍र में घोंट कर पि‍लायी गयी घुट्टी का असर था कि‍ वि‍परीत लिंगी के प्रति‍ सहज भाव नहीं रख पाया। सच में इस चक्‍कर में कई अच्‍छी लड़कि‍यों को नि‍राश और नाराज़ कि‍या। ..........................
छात्र जीवन में राजनैति‍क गति‍वि‍धि‍/ धरना-प्रदर्शन से भले ही जुड़ा रहा पर जेल की यात्रा नहीं हो पायी। .............. ऐसे कई अनुभव हैं जो होने से रह गये। अब यही कह सकता हूं कि‍ व्‍यक्‍ति‍ को आयु वि‍शेष में सभी अनुभवों को लेते रहना चाहि‍ए ताकि‍ आगे चलकर मलाल न हो........................;