Monday, 24 September 2018

क्रिश्मस का विरोध या मानसिक दीवालियापन?

क्रिश्मस का विरोध या मानसिक दीवालियापन? -----

मनुष्य चाहे तो उसका विस्तार अंतरिक्ष सा हो सकता है। गौतम बुद्ध, विवेकानंद, गाँधी, ......... जैसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है हमारे देश में।
उसी के विलोम में क्षुद्रता की भी कोई सीमा नहीं है। ये पतन इस सीमा तक हो सकता है कि अपने आप में नाभिकीय बिखण्डन का सिद्धांत शरमा जाए। संकुचित व्यक्ति सिर्फ राष्ट्र, धर्म, जाति, कुटुंब, परिवार की सीमा तक ही सीमित नहीं रहता। वह उससे भी नीचे जाकर अंततः नितांत स्वार्थी ही साबित होता है।
जो आज हिन्दू के संगठित होने की चिंता में घुले जा रहे हैं, वे मौका मिलते ही अव्वल दर्ज़े के जातिवादी भी साबित होते हैं और चुनाव के वक़्त अपनी जाति के लफंगे, दुष्ट, लोभी, भ्रस्टाचारी को भी वोट दे आते हैं। ऐसा करते समय न तो उन्हें अपने राष्ट्र की चिंता सताती है न धर्म की....
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश को एक रंग में रंगने का स्वप्न ही देशद्रोह है।

Monday, 13 July 2015

भीड़ में शामि‍ल आदमी

हर धार्मिक प्रदर्शन/आचरण, जो सार्वजनि‍क रूप से कि‍या जाये, आमतौर पर नागरि‍क बोध एवं शि‍ष्‍टता के प्रति‍कूल ही होता है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में तो ये आक्रामक भी होता है। आखि‍र और क्‍या वजह है धार्मिक जुलूसों के दौरान दंगे भड़कने की।
मैंने अपने छोटे से शहर ललि‍तपुर में ये देखा है कि‍ बाराबफात और हनुमान जयंती के जुलूस में हथि‍यारों और युद्ध - कलाओं / करतबों का प्रदर्शन दूसरे धर्माबलंबि‍यों को धमकाने के लि‍ए ही होता है या ये दर्शाने के लि‍ए कि‍ देखो हम भी तलवार उठा सकते हैं और मौका पड़ने पर सर कलम भी कर सकते हैं। ऐसे जुलूसों में ध्‍वनि‍ वि‍स्‍तारकों द्वारा होने वाले ध्‍वनि‍ प्रदूषण, आति‍शबाजी द्वारा होने वाला वायु प्रदूषण और मूर्तियां/ ताजि‍ये वि‍सर्जन से होने वाला जल प्रदूषण समूची मानवता पर बोझ है। हमारी स्‍थि‍ति‍ उस कालिदास की तरह है जो अपनी ही शाख काट रहा है।
आमतौर पर ये मानकर चला जाता है कि‍ धार्मिक कार्यक्रम / अनुष्‍ठान के लि‍ए कि‍सी भी तरह की प्रशासनि‍क अनुमति‍ आवश्‍यक नहीं है क्‍योंकि‍ इससे बहुसंख्‍यक आबादी की धार्मिक भावना जो जुड़ी है। मुट्ठीभर नास्‍ति‍कों या ऐसे नागरि‍क जो इस आक्रामक संस्‍कृति‍ के खि‍लाफ हैं, की भावना की कि‍सी को परवाह नहीं होती।
ये भी देखा है कि‍ हम एक - दूसरे की बुरी बातों को बहुत जल्‍द अपना लेते हैं जबकि‍ अच्‍छी आदतों को देर से । इसका कारण शायद यही है कि‍ बुरे काम मेहनत तलब नहीं होते। प्राय: आक्रामकता की होड़ सी मच जाती है। उस भीड़ में शामि‍ल सभ्‍य आदमी का आचरण भी उन्‍मादी ही हो जाता है। ये मनोवैज्ञानि‍क पहलू है। भीड़ में शामि‍ल आदमी अपनी पहचान ही नहीं खोता, अपने होशोहवास भी खो देता है।

Tuesday, 16 June 2015

वि‍हान

यद्यपि‍ फेसबुक पर अंतर्तम भावनाओं की अभि‍व्‍यक्‍ति‍ मुझे प्राय: बनावटी और व्‍यक्‍ति‍गत लगती है लेकि‍न फि‍र भी तुम्‍हारे 9वें जन्‍मदि‍न पर कुछ पंक्‍ति‍यां तो बनती ही हैं। ..............
तुम्हें बड़े होते देखना एक अद्भुत एहसास है। देख पा रहा हूं कि‍ अपने बचपन में मैं भी तुम्‍हारी तरह क्रि‍केट का दीवाना हुआ करता था, तुम्‍हारी ही तरह दि‍न-रात मेरे दि‍माग में लैग स्‍पि‍न, ऑफ स्‍पि‍न, चौका-छक्‍का घूमता रहता था, तुम्‍हारी ही तरह भावुक और शर्मीला हुआ करता था, तुम्‍हारी ही तरह मुझे नाचना पसंद नहीं था, .................देख पा रहा हूं कि‍ तुम मेरे ही जैसे हो।
तुम्‍हारी कई वि‍शेषतायें मुझे अपने बचपन में ले जाती हैं। तुम्‍हारे माध्‍यम से ही मैं अपने बचपन को पूर्ण कर रहा हूं। शायद कुछ दि‍न बाद तुम समझ सको कि‍ आखि‍र क्‍यों मैं तुम्‍हारे 5वें जन्‍मदि‍न पर रेलगाड़ी लाया था और आखि‍र क्‍यों तुम्‍हारे पास क्रि‍केट से जुड़ी सामग्रि‍यों की कोई कमी नहीं है।....................
शायद तुम्‍हें याद रह पाये (न भी रहे तो कोई बात नहीं) कि‍ आखि‍र क्‍यों मैं तुम्‍हें हर उस गति‍वि‍धि‍ में लि‍प्‍त होने देता हूं जो तुम्‍हें बेहद पसंद हैं। ताकि‍ तुम्‍हारे मन में अपने बचपन को लेकर कोई कसक न रह पाये। यद्यपि‍ मुझे भी अपने बचपन से कोई शि‍कायत नहीं है पर उस दौर में आज की तरह चाइनीज़ खि‍लौने और मोबाइल गेम मौजूद नहीं थे। मुझे याद है कि‍ मुझे उस समय बहुत अच्‍छा लगता था जब तुम्‍हारे दादा मुझे साइकिल के डंडे पर तौलि‍या लपेट कर बि‍ठाते थे और बाजार ले जाते थे...................मुझे नहीं पता कि‍ तुम्‍हारे मन में कौन सी बारीक स्‍मृति‍ शेष रह जायेगी इसलि‍ए अपनी ओर से तुम्‍हारे बचपन को समृद्ध करने का प्रयास करता हूं वि‍शेषकर खेलकूद से जुडी गति‍वि‍धि‍यों को..........
जी भर के जी लो अपने बचपन को.................... खूब खेलो, खूब कूदो, पूरी कॉलोनी में दौड़ते फि‍रो............

जीवन

अब तक के अपने जीवन से कोई शि‍कायत नहीं है, पर कई बातों को न कर पाने का मलाल अवश्‍य है। बचपन में शायद ही ऐसा कोई खेल हो जो न खेला हो। परि‍पूर्ण बचपन जि‍या है इसलि‍ए कोई मलाल नहीं है बस स्‍पोर्टस कॉलेज लखनऊ में क्रि‍केटर के रूप में दाखि‍ला लेने का ख्‍वाब अधूरा रह गया। स्‍कूली जीवन में साथी छात्र/छात्राओं के साथ टूर पर न जा पाना भी खलता है ......... .... ........ .................
जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही इलाहाबाद चला गया। अनुभवों की प्रयोगशाला इलाहाबाद ने बहुत कुछ सि‍खाया। पर कई बातें हैं जो नहीं कर पाया। वि‍धि‍वत रूप से हॉस्‍टल जीवन न जी पाने का मलाल है। कई अवसर मि‍लने के बावजूद प्रेमप्रसंग न हो पाने का मलाल है। सुंदर ल्रड़कि‍यां आकर्षित तो करती थीं, पर उनसे मि‍त्रता बढ़ाने से डरता था। शायद स्‍मॉल टाउन मानसि‍कता थी और सरस्‍वती शि‍शु मंदि‍र में घोंट कर पि‍लायी गयी घुट्टी का असर था कि‍ वि‍परीत लिंगी के प्रति‍ सहज भाव नहीं रख पाया। सच में इस चक्‍कर में कई अच्‍छी लड़कि‍यों को नि‍राश और नाराज़ कि‍या। ..........................
छात्र जीवन में राजनैति‍क गति‍वि‍धि‍/ धरना-प्रदर्शन से भले ही जुड़ा रहा पर जेल की यात्रा नहीं हो पायी। .............. ऐसे कई अनुभव हैं जो होने से रह गये। अब यही कह सकता हूं कि‍ व्‍यक्‍ति‍ को आयु वि‍शेष में सभी अनुभवों को लेते रहना चाहि‍ए ताकि‍ आगे चलकर मलाल न हो........................;
एंटोनियो ग्राम्शी का Hegemony यानी वर्चस्ववाद का सिद्धांत: (फेसबुक से साभार - दि‍लीप मंडल)

तस्वीर1- कर्नाटक के मंगलोर के सुब्रह्मण्या मंदिर में ब्राह्मण भोजन कर रहे हैं. खाने के बाद वे पत्तल में काफी जूठन छोड़ देंगे.
तस्वीर-2- फिर आम जनता, स्त्री-पुरुष-बच्चे उन पत्तलों और जूठन पर लोटेंगे. इस उम्मीद में कि इससे पुण्य मिलेगा या चमड़े की बीमारी ठीक होगी...आदि आदि. 500 साल से होता है. 2013 तक तो हुआ ही है.
तस्वीर-3- जब कर्नाटक सरकार ने इस पर रोक लगाने की कोशिश की और एक जांच टीम जांच करने आई तो उन्हें पुरोहितों ने नहीं, उन लोगों ने पीटा, जो जूठन पर लेटने को अपना अधिकार मानते हैं.

एंटोनियो ग्राम्शी अपनी चर्चित थ्योरी Hegemony यानी वर्चस्व में बताते हैं कि यह दो तरीके से लागू होती है. Coercion यानी जोर-जबर्दस्ती से और Consent यानी जिसे दबाया जा रहा है, उसकी सहमति से. ग्राम्शी आगे कहते हैं कि जहां लोकतंत्र आ गया है वहां Hegemony जोर जबर्दस्ती से कहीं ज्यादा सहमति से लागू की जाती है. इसके लिए संस्कृति बड़ा औजार है.
मेरे ख्याल से आप लोगों को Theory of Hegemony समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई होगी. भारत में इतना सिंपल करके पढ़ाते क्यों नहीं हैं?
सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा तो एक पक्ष ने कहा कि हमें जूठन पर लोटने दिया जाए. हमारी परंपरा है. 2014 में इस पर कोर्ट से स्टे की एक खबर आई थी.

भक्‍ति‍ यानि‍ क्‍या ?


उसके मुख्‍य अंगों पर ही एक नज़र सानी करने से बात साफ हो जाएगी कि‍ भक्‍ति‍ का मतलब है - आप भगवान (या उसके प्रतीक, चि‍ह्न, मूर्ति या चि‍त्र) के साथ वैसा बर्ताव करें, जैसा कि‍सी बेहद प्रि‍य व्‍यक्‍ति‍, अति‍थि‍ या स्‍वामी के साथ करते हैं यानि‍ धूप, दीप, नैवेद्य, ति‍लक, चरण प्रक्षालन (चरणामृत) आदि‍ के द्वारा सुवासि‍त माहौल में उसका स्‍वागत करें, फि‍र उसे स्‍वादि‍ष्‍ट चीजों के भोग लगायें, हो सके तो उसका श्रृंगार करें और उसे सुंदर वस्‍त्र भेंट में दें और भी नि‍कटता जाहि‍र करनी हो, तो उस जैसे वस्‍त्र स्‍वयं धारण कर लें और उसके व्‍यवहार का अनुकरण करें। यानि‍ स्‍वांग या रास रचायें। फि‍र उसे रि‍झाने के लि‍ए मधुर वचन बोलें, उसकी तारीफ यानि‍ स्‍तुति‍ करें। इसके अलावा उसकी आरती करके उसकी परि‍क्रमा करें जि‍सका मतलब यह है कि‍ हमारे लि‍ए - जहां तक हम घूमते वि‍चरते हैं - उसके केन्‍द्र में सि‍र्फ वह है और इतना पर्याप्‍त न लगे तो उसी के साथ रहें और सहवास या शयन तक करें। ( एक मेक ह्वे सेज न सोवै, तब लग कैसा नेह रे) स्‍पष्‍ट है कि‍ भक्‍ति‍ के ये जि‍तने अंग-प्रत्‍यंग, रूप या व्‍यवहार हैं, वे मूलत: दास-दासि‍यों के, स्‍वामि‍यों के लि‍ए खुद काे भोग वस्‍तु बना देनेे वाले व्‍यवहार हैं। इनमें 'बराबरी वाली भागीदारी' वाला अर्थ कहां और कि‍स रूप में मौजूद है - इसका खुलासा कि‍ए बि‍ना, यों ही खुद तय कि‍ए गए अर्थों को भक्‍ति‍ पर आरोपि‍त करना, कहां तक उचि‍त है?
भक्‍त की ओर से तो भक्‍ति‍ दास्‍य भाव वाली ही होती है, परंतु भगवान की ओर से कृपा के प्रदर्शन के रूप में सख्‍य, मैत्री, प्रेम, करुणा और संकट नि‍वारण जैसी बहुत सी आश्‍वासनमूलक अथवा आदर्शीकृत बातें, उम्‍मीदों की हकीकत बन जाने की तरह, जरूर घट सकती हैं। ...................................

वर्तमान साहि‍त्‍य के मार्च 2015 अंक में प्रकाशि‍त वि‍नोद शाही के आलेख ''भक्‍ति‍ : वर्चस्‍वी वर्गों की वि‍चारधारा का सांस्‍कृति‍ स्रोत'' का अंश