Tuesday, 16 June 2015

सन्नाटे को चीरती सनसनी


बात उस समय की है जब मैं इलाहाबाद में बी ए की पढाई कर रहा था। मेरे मामा जब भी सपरिवार बाहर जाते उनके दुमंजिले एकांत घर को ताकने की जिम्मेदारी मेरी होती थी। जाड़े की शांत रात को मैं सो रहा था कि कुछ अजीब सी सरसराहट की आवाज़ों ने मेरा ध्यान खींचा जो घर के ऊपरी भाग से आ रही थी। कुछ देर तक मैंने उपेक्षा की। फिर निरंतर आती सरसराहट से मुझे चोरो के होने का अंदेशा हुआ। भूत का विचार नहीं आया क्योंकि तब तक वैचारिकता मस्तिष्क में प्रवेश पा चुकी थी। मैं टॉर्च और डंडा उठा कर ऊपर पहुंचा। ताले सलामत थे। ठीक से पड़ताल की। आवाज़ भी खामोश। नीचे आकर फिर लेट गया। 05 मिनट बाद फिर से वैसी ही आवाज़। फिर ऊपर गया, आवाज़ बंद। ऐसा एक दो बार और हुआ। तब मन में "भूत" का विचार कौंधा क्योंकि बचपन से हर बच्चे के दिमाग में यह कचरा भर ही दिया जाता है। कहने में संकोच नहीं कि एकाएक रोंगटे खड़े हो गए। जाड़े की रात में पसीना आ गया। इलाहाबाद में पूज्य प्रो. ओ. पी. मालवीय एवं अन्य अग्रजों की कृपा से तब तक नास्तिकता एवं तर्कशीलता से परिचय हो चुका था। कुछ देर तक असमंजस में रहने के बाद ये निश्चय किया कि ये अनुभव भी ले ही लिया जाए। फिर सीढ़ी चढ़ कर ऊपर पहुंचा। फिर सन्नाटा। इस बार मैंने वही रुकने का निश्चय किया। मैं दूसरी मंजिल पर जा रही सीढ़ियों पर चुपचाप बैठ गया। बस 05 मिनट बाद ही वही सरसराहट बगल के कमरे से सुनाई दे गयी। मैंने तुरंत कमरे की बत्तियाँ जला दी। और जो नज़ारा देखा उसे देख देर तक हँसता रहा और राहत की सांस ली। हुआ यूँ कि एक चुहिया "चिप्स" के पैकेट को कुतरने की कोशिश कर रही थी। और चिप्स पैकेट के सरकने से निरंतर ध्वनि हो रही थी। और इतनी ध्वनि जाड़े की रात के सन्नाटे को चीरने के लिए पर्याप्त थी। ये घटना मेरे लिए ज़िन्दगी भर का सबक बन गयी।

कठपुतली

आज के बच्चे कठपुतली या puppet को शायद ही जानते हैं। हमारे बचपन से ही कठपुतली का नाच दिखाने वाले कम होना शुरू हो गए थे। कभीकभार राजस्थान का कोई कलाकार भटकता हुआ हमारे छोटे से जनपद ललितपुर में आ जाता था। एकाध बार प्रदर्शनी में कठपुतली नाच देखा था। बालसुलभ कौतूहल होता था कि ये आखिर नाच कैसे रही हैं। थोड़ा बड़े होने के बाद समझ आया कि ये कठपुतलियां अदृश्य से धागे से बंधी रहती है और कोई ऊपर से इन्हें नचाता रहता है।
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अब जबकि ये कठपुतलियां कहीं नज़र नहीं आती, तो जरा फिर से देखिये। आपको लगभग हर घर में एक या अधिक कठपुतलियां मिल जायेगी। और कमाल की बात ये कि वो भी अदृश्य से धागे से बंधी है .......

ऑंसू

ऑंसू बड़ी आश्‍चर्यजनक चीज है। मैं दो तरह के आंसुओं से ही परि‍चि‍त था - ग़म के आंसू और खुशी के ऑंसू। आंसू को वि‍रेचक भी कहा गया है। मेरा स्‍वयं का भी अनुभव है कि‍ आंसू बह जाने पर हृदय को बोझ हल्‍का होता है। यदि‍ यों कहें कि‍ आंसू ही ईश्‍वर से बातचीत का माध्‍यम है तो शायद गलत न हो। मेरे अनुसार भावुक होना इंसान होने की पहली शर्त है। ISIS के गला काटू जेहादी यदि‍ कुछ प्रति‍शत भावुक हो जायें तो शायद कुछ गले रि‍तने से बच जायें। पर धर्म को यूं ही अफीम नहीं कहा गया है। सबसे पहले ये आपकी भावुकता और इंसानि‍यत को ही हर लेता है।
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इसलि‍ए मि‍त्रों यदि‍ आंसू आयें तो छुपाये नहीं। आंसू आने के संकेत जैसे - गला रुंधना इत्‍यादि‍ उभरें, तो चुप न हो जायें। बह जाने दीजि‍ये अश्रुधारा। यद्यपि‍ हमारा जालि‍म समाज पुरुषों को सार्वजनि‍क रूप से रोने की इजाजत नहीं देता तथा उसे ''वि‍धवा वि‍लाप'', ''औरतों की तरह रो रहा है'', ''लड़कि‍यों की तरह शर्मा रहा है'' इत्‍यादि‍ घोर पुरुषवादी और सामंती कथनों से रोकने का प्रयत्‍न करता है। मान लीजि‍ये और अंतर्मन से स्‍वीकार कर लीजि‍ए कि‍ सार्वजनि‍क रूप से भावुक होना या रो पड़ने से आप प्राकृति‍क रूप से इंसान ही साबि‍त होते हैं। प्रकृति‍ ने अश्रु ऐसे ही नहीं बनाये।
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पर ध्‍यान रहे - वही ऑंसू आपको हल्‍का कर पाते हैं जि‍नका उद् गम नि‍र्मल हृदय हो। इन दि‍नों भारतीय टी.वी. संसार में आंसू सबसे ज्‍यादा बि‍क रहे हैं। रि‍यलटी शो इसका जमकर दोहन कर रहे हैं। जि‍तने ज्‍यादा आंसू, उतनी ज्‍यादा संवेदना, उतनी ही ज्‍यादा कमाई।
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और तो और इन दि‍नों कथावाचक भी अपनी दि‍व्‍य कथा में वे प्रसंग सबसे ज्‍यादा उछालते हैं जि‍नमें पब्‍लि‍क के रो पड़ने की संभावना हो जैसे - राम को वनवास, कृष्‍ण का गोकुल छोड़कर जाना, सीता मैया का परि‍त्‍याग, हुसैन की शहादत, ईसा को सूली पर चढाया जाना....पीछे से तरह-तरह के वाद्य यंत्रों से ऐसी धुन बजायी जाती है कि‍ पूरा माहौल ही गमगीन हो जाये। भक्‍तों का रो पड़ना कथा वाचक की सफलता माना जाता है।
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बाजार आधारि‍त पूंजीवाद की क्रूरतम सच्‍चाई है कि‍ उसने आंसू को भी कारोबार बना दि‍या है। लेकि‍न फि‍र भी जब दि‍ल भारी हो जाये तो नि‍र्मल अश्रुधारा प्रवाहि‍त करने में संकोच न करें। सबसे सामने न सही, अकेले में ही।

Friday, 19 December 2014

असम : जैसा मैंने देखा -


तेजपुर से काजीरंगा की ओर बढ़ते ही कुछ ही समय बाद महान ब्रहमपुत्र नदी के दर्शन होते हैं। बताता चलूं कि‍ लगभग पूरा असम ही मैदानी राज्‍य है जो चारों ओर से पर्वतीय राज्‍यों से घि‍रा है। हर वर्ष ब्रह्मपुत्र की बाढ़ असम के अधि‍कांश भाग को जलमग्‍न कर देती है। बाढ़ के समय सुदूर राज्‍यों का देश से संपर्क न कटे इसके लि‍ए राजमार्ग और रेल की पटरि‍यों को आमतौर पर 10 से 15 फुट ऊंचा बनाया गया है। बाढ़ के दौरान दोनों ओर दूर - दूर तक सि‍र्फ जलमग्‍न खेत ही दि‍खते हैं। लगभग ऐसा ही हाल बि‍हार में कोसी नदी के भराव क्षेत्र में है। रास्‍ते में दोनों ओर चाय के बागान दि‍खते रहते हैं जि‍ससे आप स्‍वत: ही ये जान जाते हैं कि‍ असम सर्वाधि‍क चाय उत्‍पादक राज्‍य क्‍यों है। असम जाकर आप ये भी समझ पायेंगे कि‍ चाय पहाड़ पर ही नहीं बल्‍कि‍ मैदानी इलाके में भी होती है। फि‍लहाल असम के चाय के वे पौधे जो 50 से 100 वर्ष पुराने हो चुके हैं, उन पर संकट मडरा रहा है। लगातार कीटनाशकों के प्रयोग से पेड़ तो खराब हो ही रहे हैं, स्‍थानीय जीव जंतु भी खतरे में हैं। ये भी जान लीजि‍ए कि‍ आपकी सुबह की चाय की प्‍याली भी कीटनाशक रसायनों से अछूती नहीं है। इसीलि‍ए कुछ जागरूक चाय उत्‍पादकों ने आर्गेनि‍क चाय उत्‍पादन प्रारंभ कर दि‍या है ताकि‍ उनके बागान भी बचे रहें और चाय पीने वाले की सेहत भी। ये भी बता दूं कि‍ ऑर्गेनि‍क चाय (जि‍से पैदा करने में शतप्रति‍शत प्राकृति‍क तरीकों का इस्‍तेमाल कि‍या जाता है) की कीमत लगभग 1000 रु. प्रति‍ कि‍ग्रा. है। यानि‍ आप जो वाह ताज करते रहते हैं, वह उतनी सेहतमंद नहीं है जि‍तना दावा कि‍या जाता है।यह दावा कि‍या जाता है कि‍ चाय में एंटीऑक्‍सीडेंट तत्‍व होने के कारण यह सेहत के लि‍ए वरदान है।
चाय के बागानों के मध्‍य से गुजरते हुए आप कब काजीरंगा की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, पता ही नहीं चलता। राजमार्ग से ही आपको गैंडा व अन्‍य जानवर दि‍खने लगते हैं। काजीरंगा राष्‍ट्रीय उद्यान को एक श्रृंगी भारतीय गेंडे के कारण वि‍श्‍व धरोहर का दर्जा प्राप्‍त है। लगभग 467 वर्ग कि‍मी. में फैला ये अभ्‍यारण फि‍लहाल संकट में है। 467 वर्ग कि‍मी. कोई बहुत बड़ा क्षेत्र (केवल 20 x 23 कि‍मी.) नहीं है । आप यदि‍ ये सोच कर खुश हो रहे हैं कि‍ अब भी देश में इतने जंगल बचे हैं, तो थोड़ा कम खुश हों। अपनी सींग के कारण भारतीय गैंडे का नि‍रंतर अवैध शि‍कार कि‍या जा रहा है तथा इनकी संख्‍या बहुत तेजी से कम हो रही है। जि‍स बात ने सबसे ज्‍यादा दु:खी कि‍या, वह यह है कि‍ मैंने काजीरंगा अभ्‍यारण इलाके में हजारों झुग्‍गि‍यां बसी देखी हैं जो जंगल को काटकर बनी हैं। इनमें हजारों की संख्‍या में बांग्‍लादेशी घुसपठि‍ये रह रहे हैं। स्‍थानीय ड्राइवर ने बताया कि‍ इन बांग्‍लादेशि‍यों को असम के राजनेताओं का संरक्षण प्राप्‍त है तथा अब तो इनके आधार कार्ड भी बन रहे हैं। ये घुसपैठि‍ये बि‍ना कि‍सी चिंता के जंगल के बीच रह रहे हैं क्‍योंकि‍ इस जंगल में बाघ नहीं है और प्राय: सभी जानवर आग से डरते हैं। ये घुसपैठि‍ये जंगल की ही लकड़ी को ईंधन के रूप में इस्‍तेमाल कर रहे हैं तथा जंगली जानवरों - वनमुर्गी, हि‍रण, सांभर, भैसा इत्‍यादि‍ को मार कर खाते हैं। लकड़ी काटना तथा शि‍कार करना आमदनी का आसान जरि‍या है।
अब भी वन्‍य जीव व प्रकृति‍ बची हुई है। यदि‍ जल्‍द ही घुसपैठ के मुद्दे पर राजनीति‍ बंद नहीं हुई तो यकीन मानि‍ये यह देश बहुत कुछ खो बैठेगा।

Friday, 14 November 2014

आरती या स्‍वयं का अवमूल्‍यन

मैं बहुत पहले से ऐसा मानता रहा हूं कि‍ ईश्‍वर के सामने स्‍वयं को दीन हीन रूप में प्रस्‍तुत करना गलत है। आरती या प्रार्थना ऐसी हो जो हमें ईश्‍वर से जोड़े न कि‍ उसकी व अपनी नज़रों में गि‍राये। ...................इस मामले में हिंदी फि‍ल्‍मों के कुछ गीत बेहतरीन हैं, जैसे - ''तू प्‍यार का सागर है, तेरी एक बूंद के प्‍यासे हम''
या
''तेरी है जमीं, ये तेरा आसमां''
या
''हमारी ही मुट्ठी में संसार सारा'',
या
''ज्‍योति‍ कलश छलके'',
....... इत्‍यादि‍

ईश्‍वर की महानता और वि‍शालता को साबि‍त करने के लि‍ए इंसान को स्‍वयं को तुच्‍छ साबि‍त करने की आवश्‍यकता नहीं है। जि‍सने यह संसार रचा है, उसकी महि‍मा के वर्णन के लि‍ए चाटुकारि‍ता आवश्‍यक नहीं है। ईश्‍वर महान है और रहेगा परंतु उसके लि‍ए मैं स्‍वयं को मूर्ख, खल और कामी मानने को तैयार नहीं हूं।

नेहरू एक अंतरराष्‍ट्रीय नेता

पहली पंचवर्षीय योजना में ही icar, इसरो, drdo, csir, एनपीएल, ncl....की स्थापना...........जल विद्युत एवं सिंचाई के लिए तमाम विशाल बाँधो का निर्माण, हरित क्रांति.......देश को वैज्ञानिक सोच की ओर ले जाना.......और भी न जाने क्या - क्या जो सीमित संसाधनों के साथ एक हाल ही में आज़ाद हुआ देश कर सकता था। ...........नेहरू जैसा देशभक्त और प्रधानमन्त्री बेहद आवश्यक था उस दौर में....लोगो का क्या जो कोई भी आरोप लगाने के पूर्व जानकारी लेना या इतिहास के पन्ने पलटना भी उचित नहीं समझते।

सच्‍चाई ये है कि‍ आजादी के समय नेहरू की छवि‍ एक अंतरराष्‍ट्रीय नेता या स्‍टेट्समैन की थी। वे उस समय पश्‍चि‍मी जगत में भारत का ऐसा चेहरा थे जि‍से पहचाना जाता था। और नवर्नि‍मित राष्‍ट्र के समक्ष पहचान का संकट कैसा होता है, इसको समझाने की आवश्‍यकता नहीं है। दुनि‍या आपको सि‍र्फ आपके प्रति‍नि‍धि‍यों के माध्‍यम से पहचानती है, ठीक वैसे ही जैसे दक्षि‍ण अफ्रीका का नाम लेते ही नेल्‍सन मंडेला याद आते हैं। ..................................................
मुझे ये भी अफसोस रहता है कि‍ लोग नेहरू पर सहजभाव से पश्‍चि‍मी वि‍चारों से अभि‍प्रेत होने का आरोप लगा देते हैं, वे भूल जाते हैं कि‍ 'डि‍स्‍कवरी ऑफ इंडि‍या' के लेखक की भारतीय परंपरा की समझ कैसी रही होगी, और 'द गि‍लि‍म्‍पसेंज ऑफ वर्ल्‍ड हि‍स्‍ट्री' जैसी पुस्‍तक जेल में ही लि‍ख डालने वाले की वि‍श्‍व इति‍हास पर कि‍तनी पकड़ रही होगी ............................ पर आलोचकों को इससे क्‍या.................. न ही उन्‍होंने इन दोनों कि‍ताबों को पढ़ा (मेरा दावा है कि‍ देखा तक नहीं होगा) होगा, न कभी पढेंगे....................... उन्‍हें तो सि‍र्फ लेडी माउंटबेटेन को सि‍गरेट पि‍लाते नेहरू ही याद हैं.............

Wednesday, 3 September 2014

हमारा नजरि‍या और हमारे वि‍चार

हम नि‍रंतर बदलते ही रहते हैं। कहने का मतलब हमारा नजरि‍या और हमारे वि‍चार व्‍यक्‍ति‍ सापेक्ष होते हैं। जो हमें अच्‍छा लगता हो या जि‍सकी बातों से हम सहमत हो, उसकी हर चीज - बोलना, खाना, पीना, रहना, वेशभूषा, वि‍चार इत्‍यादि‍ सब अच्‍छे लगने लग जाते हैं। और जि‍ससे हमारी पटरी नहीं बैठती, उसकी प्राय: सभी बातें बुरी ही लगती हैंं। ....................... लेकि‍न क्‍या हमें अपने वि‍चार इतने आसानी से बदल जाने देने चाहि‍ए?.................................................... यह बात मोदी जी की बेशभूषा को देखकर मन में आयी। उन्‍होंने इस समय अपने सुरुचि‍पूर्ण पहनावे से देश को ही नहीं वरन दुनि‍या को भी प्रभावि‍त कि‍या है। मोदी कुर्ता बाकायदा फैशन है इन दि‍नों। सच कहूं तो मुझे उनका शौक और फैशनपरस्‍त होना अच्‍छा लगता है और उनकी वेशभूषा का कलर कॉम्‍बीनेशन भी बहुत अच्‍छा होता है। हालाकि‍ मेरे वामपंथी मि‍त्र मुझे बूर्जूआ कह सकते हैं। परंतु मेरी यह व्‍यक्‍ति‍गत राय है कि‍ व्‍यक्‍ति‍ को शौक जरूर पालने चाहि‍ए।........................... पर एक बात मैं अपने संघी भाईयों या दक्षि‍णपंथी भाईयों के मुख से हमेशा से सुनता आया हूं कि‍ नेहरू के कपड़े पेरि‍स धुलने जाते थे (हालाकि‍ इस बात प्रामाणि‍कता कुछ भी नहीं है क्‍योंकि‍ आज से 100 साल पहले भी भारत में ड्राइ्रक्‍लीनिंग न सही, क्‍लीनिंग की व्‍यवस्‍था तो थी ही। और न भी रही हो तो पेरि‍स से कपड़े धुलवाने के बजाए नए कपड़े सि‍लवाना बेहतर वि‍कल्‍प होता).................. क्‍या ऐसा नहीं है कि‍ जो हमें अच्‍छा लगे उसका शौक, शौक और जो बुरा लगे उसका शौक, वि‍लासि‍ता...... ?