हम
निरंतर बदलते ही रहते हैं। कहने का मतलब हमारा नजरिया और हमारे विचार
व्यक्ति सापेक्ष होते हैं। जो हमें अच्छा लगता हो या जिसकी बातों से
हम सहमत हो, उसकी हर चीज - बोलना, खाना, पीना, रहना, वेशभूषा, विचार
इत्यादि सब अच्छे लगने लग जाते हैं। और जिससे हमारी पटरी नहीं बैठती,
उसकी प्राय: सभी बातें बुरी ही लगती हैंं। ....................... लेकिन
क्या हमें अपने विचार इतने आसानी से बदल जाने देने चाहिए?....................... .............................
यह बात मोदी जी की बेशभूषा को देखकर मन में आयी। उन्होंने इस समय अपने
सुरुचिपूर्ण पहनावे से देश को ही नहीं वरन दुनिया को भी प्रभावित किया
है। मोदी कुर्ता बाकायदा फैशन है इन दिनों। सच कहूं तो मुझे उनका शौक और
फैशनपरस्त होना अच्छा लगता है और उनकी वेशभूषा का कलर कॉम्बीनेशन भी
बहुत अच्छा होता है। हालाकि मेरे वामपंथी मित्र मुझे बूर्जूआ कह सकते
हैं। परंतु मेरी यह व्यक्तिगत राय है कि व्यक्ति को शौक जरूर पालने
चाहिए।....................... ....
पर एक बात मैं अपने संघी भाईयों या दक्षिणपंथी भाईयों के मुख से हमेशा से
सुनता आया हूं कि नेहरू के कपड़े पेरिस धुलने जाते थे (हालाकि इस बात
प्रामाणिकता कुछ भी नहीं है क्योंकि आज से 100 साल पहले भी भारत में
ड्राइ्रक्लीनिंग न सही, क्लीनिंग की व्यवस्था तो थी ही। और न भी रही हो
तो पेरिस से कपड़े धुलवाने के बजाए नए कपड़े सिलवाना बेहतर विकल्प
होता).................. क्या ऐसा नहीं है कि जो हमें अच्छा लगे उसका
शौक, शौक और जो बुरा लगे उसका शौक, विलासिता...... ?
Wednesday, 3 September 2014
Tuesday, 29 July 2014
मानसून का लोटा
मध्यप्रदेश
के उत्तरी भाग में होने के कारण ग्वालियर बारिश के मामले में पिछड़ जाता
है। बंगाल की खाड़ी का मानसून बगल से निकल कर दिल्ली तक पहुंच जाता है और
ग्वालियर वासी अच्छे दिन की राह तकते रहते हैं। अरब सागर के मानसून का
लोटा ग्वालियर तक आते - आते खाली हो जाता है। अत: जब भी 'म.प्र. में बारिश
का तांडव' इत्यादि शीर्षक से छपी खबरें पढ़े, तो उसमें से ग्वालियर को
हटाना न भूलें। पिछले 14 साल से ग्वालियर
में हूं, पर बारिश का तांडव नहीं देखा। यहां के लोगों से पूछो तो सगर्व
कहते हैं कि हमारे बचपन में तो 5 - 7 दिन की झिर लगती थी, अब नहीं लगती।
वजह एक ही है- जंगलों की कटाई। पास के शिवपुरी के जंगलों से बाघ को गायब
हुए वर्षों हो गए, सोनचिरैया कई साल से नहीं दिखी है, मुरैना के मोर कम हो
रहे हैं, आसपास नज़र दौडायें तो बबूल की झाड़ियां हीं नज़र आती हैं, फलदार
वृक्ष न के बराबर हैं। जुलाई में भी सूरज देवता इतने प्रसन्न रहते हैं कि
हरा जामुन ठुर्रा कर सीधा पीला हो जाता है, उसे बारिश से फूलकर बैगनी होते
नहीं देखा। हो भी जाये तो जामुन का आकार कंचे के बराबर ही होता
है।........................... . बारिश के तांडव की राह तकता सूखा मन
Saturday, 19 July 2014
राष्ट्रवाद बनाम मानवतावाद
यह दौर भले ही विश्व भर में राष्ट्रवाद के उभार का दौर है। राष्ट्रवाद
को लेकर सभी की अपनी - अपनी अवधारणा है। मेरी भी है। राष्ट्रवाद की सोच
भले ही व्यक्ति और समाज से एक पायदान ऊपर है परंतु अंतत: कहीं न कहीं ये
संकुचित विचारधारा ही है। भीष्म पितामह इसी राष्ट्रवाद के मोह में
दुराचारियों का साथ देते रहे। महाराणा प्रताप का राष्ट्रवाद मेवाड़ तक
सीमित था और अगल - बगल के भारतीय राजपूत भी उनके शत्रु थे। भारतवासियों
का राष्ट्रवाद उन्हें भारत को विश्वगुरू बनने का स्वप्न
दिखाता है। तो इज़राइल और फिलिस्तीन वासियों की अपने राष्ट्र को
सर्वोपरि मानने की अपनी धारणा है। अत: जब सारे भेद खुल चुके हैं और सारे
हालात हमारे सामने हैं, मैं ऐसी किसी भी अवधारणा के साथ नहीं हो सकता जो
स्वयं को, अपने परिवार, अपनी जाति, अपने क्षेत्र, अपने समाज, अपने
प्रदेश, अपनी भाषा, अपने राष्ट्र को सर्वोपरि मानती हो। ऐसी श्रेष्ठता
किस काम की कि मनुष्य की पीड़ा ही दिखायी न दे। मैं लखनऊ और बंगलौर के
बलात्कार से भी उतना ही आहत होता हूं जितना गाजा में एक हिंसक तंत्र
द्वारा भाेलेभाले नागरिकों की हिंसा से। मैं ऐसा भारत नहीं चाहता जो अपने
आस-पास के राष्ट्रों एवं गरीब राष्ट्रों का शोषण करे। अत: राष्ट्रवाद से
कहीं बढ़कर है ''मानवतावाद''। मनुष्य को बचाओ, राष्ट्र अपनेआप बच
जायेगा।
मंशापूर्ण माता मंदिर
मेरे
घर के पास ऐसे दो मंदिर हैं जिनका नाम मंशापूर्ण है - मंशापूर्ण माता
मंदिर और मंशापूर्ण हनुमान मंदिर। यानि शब्द के अनुसार देखें ताे ये
ऐसे मंदिर हैं जहां आने पर भक्तों की मंशापूर्ण होती है। इन नामों पर
विचार करते - करते दो प्रश्नों का उत्तर भी खोज रहा हूं -
1. क्या यह मंदिर सभी तरह के लोगों की सभी तरह की अभिलाषायें पूर्ण करता है? यदि ऐसा है तो बहुत ही खतरनाक बात है। हाफिज सईद या अन्य आतंकवादियों की अभिलाषा तो दूर की बात है, किसी जेबकतरे या शराबी की अभिलाषा भी समाज के लिए बहुत घातक है।
2. क्या अन्य मंदिर जिनके नाम मंशापूर्ण नहीं हैं, वे भक्तों की मंशापूर्ण नहीं करते ?
आस्तिक भक्त इन प्रश्नों से चिढें नहीं, बल्कि ये उत्तर तलाशें कि कहीं ऐसा हमारे लालच के दोहन के लिए तो नहीं है। .....................
आज ही ग्वालियर के एक डाॅक्टर साहब बता रहे थे कि उनकी क्लीनिक की सफलता का सारा श्रेय सांई बाबा को जाता है। जबसे वे उनके भक्त बने हैं, उनके क्लीनिक में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि हुई है। ................. उनकी बात सुनकर मुझ जैसे पापात्मा के मन में सबसे पहले यही प्रश्न कौधा कि क्या सांई बाबा अपने भक्त के क्लीनिक को दिन दूना रात चौगुना बढ़ाने के लिए पूरे मुहल्ले को बीमार करने पर आमादा हैं?
1. क्या यह मंदिर सभी तरह के लोगों की सभी तरह की अभिलाषायें पूर्ण करता है? यदि ऐसा है तो बहुत ही खतरनाक बात है। हाफिज सईद या अन्य आतंकवादियों की अभिलाषा तो दूर की बात है, किसी जेबकतरे या शराबी की अभिलाषा भी समाज के लिए बहुत घातक है।
2. क्या अन्य मंदिर जिनके नाम मंशापूर्ण नहीं हैं, वे भक्तों की मंशापूर्ण नहीं करते ?
आस्तिक भक्त इन प्रश्नों से चिढें नहीं, बल्कि ये उत्तर तलाशें कि कहीं ऐसा हमारे लालच के दोहन के लिए तो नहीं है। .....................
आज ही ग्वालियर के एक डाॅक्टर साहब बता रहे थे कि उनकी क्लीनिक की सफलता का सारा श्रेय सांई बाबा को जाता है। जबसे वे उनके भक्त बने हैं, उनके क्लीनिक में दिन-दूनी रात चौगुनी वृद्धि हुई है। ................. उनकी बात सुनकर मुझ जैसे पापात्मा के मन में सबसे पहले यही प्रश्न कौधा कि क्या सांई बाबा अपने भक्त के क्लीनिक को दिन दूना रात चौगुना बढ़ाने के लिए पूरे मुहल्ले को बीमार करने पर आमादा हैं?
महात्मा गांधी को गाली
शायद
महात्मा गांधी को गाली देना इस देश में सबसे आसान है। ताजा उदाहरण अरुंधती
रॉय का है। उनके कई बयानों का मैं विरोधी एवं प्रशंसक, दोनों रहा हूं।
परंतु हमेशा सनसनीखेज बयान देना ही आपके प्रगतिशील हाेने का प्रमाण नहीं
होता। ............. गांधी जी को गाली तो संघ वाले भी देते
हैं.............. क्योंकि गांधी को गाली देना सबसे आसान है। गांधी को
गाली देने से किसी की भावनायें आहत नहीं होती और पिटने का
भी डर नहीं होता। क्या ऐसी गालियां अंबेडकर, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह
या नमो को दी जा सकती हैं। गांधी तो इस मामले में भी कम रह गए कि उनके
अपमान पर न कोई हिंदू वादी संगठन कुछ बोलता है, न वामपंथी, न प्रगतिशील, न
गुजराती और तो और किसी अखिल भारतीय वैश्य - गहोई समाज की भावनायें भी
आहत नहीं होती है।................ सो बिना संकोच गाली देते रहें। आप
जितनी गाली उस महात्मा को देंगे, वो आपको उतना ही अधिक बेचैन करेगा।
Friday, 11 July 2014
फेसबुक और गांधीवाद
सभी जानते हैं कि फेसबुक एक मुक्त आकाश है। जिसे जो मन में आये लिखे/
साझा करे। पर जब हम इस सुविधा को इस्तेमाल किसी को कोसने और गाली देने
में करते हैं, तो मामला गड़बड़ हो जाता है। फेसबुक पर नाथूराम गोडसे फैन्स
क्लब भी है। अब नाथूराम के फेन हैंं तो गांधी को कोसना तो उनका
राष्ट्रधर्म हो ही जाता है। .............. एक मित्र की दीवार पर ऐसी ही
पोस्ट पढ़ी जिसमें दो माह पूर्व इंडिया टुडे की खबर को आधार बनाते हुए
गांधी जी को व्यभिचारी और नारीलोलुप साबित किया गया। ............................
बात दृष्टि की है। आपको जो अच्छा लगता है, आप उस पर यकीन करना चाहते
हैं। मैं ऐसे सैकड़ों आलेख बता सकता हूं जिनमें गांधीजी को संत बताया गया
है और उपर्युक्त सभी आरोपों को एक प्रयोग। ...............आज भी जैन मुनि
किसी की नज़र में संत हैं तो किसी की नज़र में बेशर्म कि जवान
लड़कियों के समक्ष नंगधडंग बैठे रहते हैं। ऐसे लोग उनके त्याग और तपस्या
के बारे में सोचना नहीं चाहते।............... और बात ये भी है कि इस
प्रकार के लेख लिखने के पीछे मंशा क्या है और शब्द-चयन कैसा
है..............मैं चाहूं तो नाथूराम गोडसे के बारे में कुछ भी अनाप-शनाप
लिख सकता हूं, शब्दों और भावों की कोई कमी नहीं है। पर गांधीवाद मुझे ऐसा
करने से रोकता है।.......... दुख ये है कि गांधी को कोसते समय कोई
गांधीवाद पर विचार नहीं करता........ ये गांधी का ही असर है कि इस
लोकतंत्र में किसी को भी कोई भी बकवास करने, गाली देने की छूट प्राप्त
है। जरा विचार करें कि क्या किसी व्यभिचारी के पीछे लाखों का जनसमूह
लगभग 35 वर्ष तक साथ रह सकता है? क्या वजह है कि मोदी जी शपथ लेने के
पहले राजघाट जाते हैं और प्रधानमंत्री की सीट पर बैठने के पहले गांधी की
फाेटो पर पुष्प अर्पित करते हैं?.................
Sunday, 6 July 2014
'आप'
यदि
सांप्रदायिक और जातिगत आधार पर वोटिंग होती तो आम आदमी पार्टी की
स्थिति इतनी शानदार नहीं होती.................दिल्ली की जनता ने
परिपक्वता का परिचय दिया है। पिछले चुनाव में 16प्रतिशत वोट लाने
वाली बीएसपी पूरे परिदृश्य से गायब हो गयी है जिसका लाभ 'आप' को मिला।
मेरे हिसाब से दिल्ली में ये कांग्रेस और भाजपा दाेनों की हार है।
कांग्रेस की इसलिए कि वे जनता का मूड भाप नहीं पाये और
आाप काे लगातार खारिज करते रहे। भाजपा की हार इसलिए कि उन्होंने मोदी
को ही सभी मर्जों की दवा मान लिया और बिस्तर तान के सो गए।
..........................
अब भी समय है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा मोदी फैक्टर को इतना सशक्त न माने। पर आम आदमी पार्टी की सही जीत मैं उस दिन मानूंगा जब वह उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा जैसी पार्टियों को शिकस्त देगी। दिल्ली की शिक्षित जनता को समझााना आसान है पर साइकिल और हाथी देखकर मतवाली हो जाने वाली भीड़ को समझााना मुश्किल............'आप' के पदार्पण के बाद क्या हालत हो गयी है परंपरागत राजनीति की..........बहुमत से तीन सीट दूर बैठी बीजेपी भी 'हॉर्स ट्रेडिंग' के जोखिम को उठाने को तैयार नहीं है। अब से कुछ वर्ष पहले ऐसी स्थिति होती तो अब तक तो मंत्रीमंडल भी तय हो गया होता.........ऐसा भी दिन आयेगा कि राजनीतिक दल सरकार बनाने से कतरायेगे, सोचा न था...................अगर 'आप' ने जैसी संगठनात्मक क्षमता दिल्ली में दर्शायी है, वैसी ही उत्तर प्रदेश में दर्शा दे, तो यकीन मानिये यू.पी. की जनता इतनी त्रस्त है कि उन्हें सिर ऑंखों पर बैठा लेगी....................
अब भी समय है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा मोदी फैक्टर को इतना सशक्त न माने। पर आम आदमी पार्टी की सही जीत मैं उस दिन मानूंगा जब वह उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा जैसी पार्टियों को शिकस्त देगी। दिल्ली की शिक्षित जनता को समझााना आसान है पर साइकिल और हाथी देखकर मतवाली हो जाने वाली भीड़ को समझााना मुश्किल............'आप' के पदार्पण के बाद क्या हालत हो गयी है परंपरागत राजनीति की..........बहुमत से तीन सीट दूर बैठी बीजेपी भी 'हॉर्स ट्रेडिंग' के जोखिम को उठाने को तैयार नहीं है। अब से कुछ वर्ष पहले ऐसी स्थिति होती तो अब तक तो मंत्रीमंडल भी तय हो गया होता.........ऐसा भी दिन आयेगा कि राजनीतिक दल सरकार बनाने से कतरायेगे, सोचा न था...................अगर 'आप' ने जैसी संगठनात्मक क्षमता दिल्ली में दर्शायी है, वैसी ही उत्तर प्रदेश में दर्शा दे, तो यकीन मानिये यू.पी. की जनता इतनी त्रस्त है कि उन्हें सिर ऑंखों पर बैठा लेगी....................
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