भौत
दु:खी हूं.................. छह महीने पहले जिस ऐंड्रायड फोन को अद्यतन
(Latest) प्रौद्योगिकी वाला मानकर खरीदा था, अब वह बूढ़ा घोषित हो गया
है........... ऐसा विकास का मॉडल भी किस काम का, जो छह महीने में आपको
बूढ़ा घोषित कर दे अौर साल डेढ़ साल में जबरदस्ती रिटायर करा
दे............. चाहूं या न चाहूं, कुछ दिन में इस माेबाइल को अलविदा
कहने को विवश हो जाऊंगा। .............. एक ये प्रौद्योगिकी है जो कंगारू
की तरह कुलांचे मार रही है और दूसरी ओर पूरा चिकित्सा विज्ञान अब भी
चंद एंटीबायोटिक पर ही र्निभर हैं................ फिर वही इंडिया और
भारत के बीच का मामला
Sunday, 6 July 2014
सच्चे हिंदू
अभी -
अभी फेसबुक पर टहलते हुए पढ़ा कि एक अंग्रेज व्यापारी गीता के कुछ
श्लोक पढ़कर हिंदू धर्म से इतना प्रभावित हुआ कि अपना घरबार छोड़कर साधु
बन गया। जिन महोदय ने ये सूचना साझा की, उन्होंने यह भी लिखा कि
फेसबुक पर मौजूद सच्चे हिंदू इस पर लाइक ठोको ताकि दुनिया में हिंदू धर्म
का डंका बज जाये। ............. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मुझे इस
पोस्ट पर हंसना चाहिए या रोना............. एक अंग्रेज
धर्म का मर्म समझ गया और आप लाइक ठुकवाने में लगे हैं। दरअसल आप अपनी सोच
में इतने छोटे हो गए हैं कि केवल हिंदूओं (सच्चे वाले) से इस पर लाइक
ठोकने की अपील कर रहे हैं और स्वयं को फेसबुक पर स्वामी विवेकानंद समझ
रहे हैं। आपको ये भी समझने का शऊर नहीं है कि वो अंग्रेज क्या फेसबुक पर
लाइक ठोक कर हिंदू धर्म से प्रभावित हुआ था?........................... .....................ऐसे हिंदुओं से भगवान बचाये
समाज को हिंसक बनाने का एक नया तरीका
मैं
ऐसे कई लोगों को जानता हूँ जो डिस्कवरी चैनल पर शेर द्वारा निरीह मेमने के
शिकार के दृश्य से भी विचलित हो जाते हैं। हिंसा तो छोडिये मासाहार करते
लोगों को देखते ही उन्हें वितृष्णा हो जाती है। सिनेमा और टी वी भी हिंसक
और अश्लील दृश्यों को दिखाने के पहले एडवाइजरी जारी करते हैं या उस हिस्से
को सेंसर कर देते हैं। और ऐसा करना भी चाहिए। पर इन दिनों इराक में इस्लामी
आतंकियों द्वारा लोगों के सिर कलम करने और
कटे नरमुंडों के दृश्य फेसबुक पर आम हो गए हैं। कुछ मित्र इन हिंसक
दृश्यों को इस्लाम के हिंसक चेहरे के नाम पर लगातार शेयर कर रहे हैं। मुझे
नहीं पता कि वे ऐसा इराक की निरीह जनता और बच्चों के प्रति गहरी संवेदना के
चलते कर रहे हैं, इराक की समस्या को फेसबुक के माध्यम से सुलझाने के
दिवास्वप्न के चलते कर रहे हैं, या इस बहाने इस्लाम की तुलना में हिन्दू
धर्म को श्रेष्ठ साबित करने में जुटे हैं पर इन हिंसक दृश्यों को देखकर मुझ
जैसे अनेक लोग विचलित हो रहे हैं। ये हमारे समाज को हिंसक बनाने का एक नया
तरीका है। क्या यथार्थ चित्रण के नाम पर संवेदनाओं से खेलना उचित है? क्या
इन दृश्यों को वे अपने बच्चों और घर की महिलाओं को दिखा सकते हैं? यदि
नहीं तो आप सभी से गुजारिश है कि अपने समाज की भावनाएं कोमल बनी रहने दें।
हम अपने देश को इराक नहीं बनाना चाहते। इकबाल का शेर उन आतंकियों पर सटीक
बैठता है-
"तुम्हारी तहजीब अपने खंज़र से ख़ुदकुशी करेगी,
शाखे-नाज़ुक पे जो आशियाँ होगा, नापायेदार होगा।"
"तुम्हारी तहजीब अपने खंज़र से ख़ुदकुशी करेगी,
शाखे-नाज़ुक पे जो आशियाँ होगा, नापायेदार होगा।"
चमत्कार को नमस्कार
'चमत्कार
को नमस्कार' काफी प्रचलित कहावत है हमारे समाज में। स्वयं को परंपरागत
सनातनी तो नहीं मानता, क्याेंकि वैसा आचरण नहीं है। परंतु शंकराचार्य -
सांई विवाद के चलते कुछ प्रश्न हैं जो मन में उठ रहे हैं -
1. यदि सांई सर्वधर्म समभाव के प्रतीक हैं तो सांई के मंदिर को 'मंदिर' ही क्यों संबोधित किया जाता है, सांई मस्जिद, सांई चर्च, सांई जिनालय या सांई गुरुद्वारा क्यों ? सांई भक्त कोई नया नाम क्यों नहीं गढ़ लेते?
2. सांई को यदि सूफी माना लिया जाये तो उनकी सर्वधर्म समभाव या हिंदु - मुस्लिम एकता संबंधित रचनायें कहाँ हैं?
3. हिंदू और मुस्लिम भक्त होने मात्र से क्या उन्हें सूफी कहा जा सकता है? यदि हां तो क्या निर्मल बाबा को सूफी संत कहा जा सकता है?
4. सांई के दर्शन या मत को प्रतिपादित करती हुई रचना कौन सी है? या केवल चमत्कार ही भक्ति का अाधार है?
5. यदि चमत्कार ही भक्ति का आधार है तो क्या सांई भक्त 100 साल बाद निर्मल बाबा या जादूगर पी.सी.सरकार को भी इसी तरह पूजने लग जायेंगे?
6. सांई की प्रतिमा पारंपरिक हिंदु देवी देवताओं के मध्य स्थापित करना कहां तक जायज है? क्या ऐसा मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा में किया जा सकता है?
7. बेचारे सांई बाबा जिन्होंने पूरा जीवन फक्कड़ी में गुजारा, उन्हें चांदी की प्रतिमा और सोने का मुकुट लगाना क्या उनका अपमान नहीं है?
न ही परंपरागत हिंदू हूं, न सांई बाबा का विरोधी , पर शंकराचार्य के कुछ प्रश्न जायज लगते हैं। मुझे ज्यादा समस्या 'अंध भक्तों' और धर्म स्थलों से जुड़ी व्यावसायिकता से है।
1. यदि सांई सर्वधर्म समभाव के प्रतीक हैं तो सांई के मंदिर को 'मंदिर' ही क्यों संबोधित किया जाता है, सांई मस्जिद, सांई चर्च, सांई जिनालय या सांई गुरुद्वारा क्यों ? सांई भक्त कोई नया नाम क्यों नहीं गढ़ लेते?
2. सांई को यदि सूफी माना लिया जाये तो उनकी सर्वधर्म समभाव या हिंदु - मुस्लिम एकता संबंधित रचनायें कहाँ हैं?
3. हिंदू और मुस्लिम भक्त होने मात्र से क्या उन्हें सूफी कहा जा सकता है? यदि हां तो क्या निर्मल बाबा को सूफी संत कहा जा सकता है?
4. सांई के दर्शन या मत को प्रतिपादित करती हुई रचना कौन सी है? या केवल चमत्कार ही भक्ति का अाधार है?
5. यदि चमत्कार ही भक्ति का आधार है तो क्या सांई भक्त 100 साल बाद निर्मल बाबा या जादूगर पी.सी.सरकार को भी इसी तरह पूजने लग जायेंगे?
6. सांई की प्रतिमा पारंपरिक हिंदु देवी देवताओं के मध्य स्थापित करना कहां तक जायज है? क्या ऐसा मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारा में किया जा सकता है?
7. बेचारे सांई बाबा जिन्होंने पूरा जीवन फक्कड़ी में गुजारा, उन्हें चांदी की प्रतिमा और सोने का मुकुट लगाना क्या उनका अपमान नहीं है?
न ही परंपरागत हिंदू हूं, न सांई बाबा का विरोधी , पर शंकराचार्य के कुछ प्रश्न जायज लगते हैं। मुझे ज्यादा समस्या 'अंध भक्तों' और धर्म स्थलों से जुड़ी व्यावसायिकता से है।
सांई भक्ति
शंकराचार्य
द्वारा सांई भक्ति पर उठाये गए प्रश्नों में लोगों की पृथक राय हो सकती
है। परंतु मंदिरों में देव प्रतिमाओं के बीच या मंदिर प्रांगण में सांई
बाबा को बैठाने का कार्य कई पुजारी सहर्ष करते रहे हैं। निस्संदेह ये
वही पुजारी हैं जो मंदिर को एक दिव्य स्थल के बजाय निज संपत्ति एवं
आय का अक्षय स्रोत मानकर चलते हैं। पुजारी जी ने जैसे ही देखा कि सांई
बाबा की दुकान चल निकली है, वैसे ही स्वयं अपने मंदिर में लेकर बैठ गए सांई बाबा को ............ .............................. .............................. ..........
................. ........... ...... ......................जैसे कुछ
किराने की दुकान पे बोर्ड टंगा होता है कि 'यहां मोबाइल रिचार्ज होता
है'........................ उसी तर्ज पर पारंपरिक भगवान के साथ-साथ सांई
बाबा, शनि महाराज....... इत्यादि भी स्थापित कर दिए जाते हैं। कहीं
ग्राहक भाग न जाये अथवा बगल की दुकान में न चला
जाये........................ और संकट यह है कि बगल के शोरूम में पालकी,
भंडारा, आरती, रेवड़ी, सर्व धर्म पूजोपासना, अगरबत्ती, लोवान, भगवा झंडा,
हरा झंडा सब मौजूद हैं।..................... अत: सांई भक्ति के विरोध
से ज्यादा जरूरी है धार्मिक व्यावसायिकता पर रोक । अमीर मंदिरों/
मस्जिदों/ गुरुद्वारों/ चर्च/ जिनालय/ मठ/ आश्रम से 30% आयकर क्यों न
बसूला जाये ?
महाभारत और रामायण
महाभारत
और रामायण में सभी को वेदों का अध्ययन करते बताया गया है। यानि यह तय है
कि महाभारत और रामायण उत्तर वैदिक काल के हुए। पूर्व वैदिक काल के
नहीं। और तमाम शोधों के बाद प्रथम वेद ऋग्वेद का समय 1500 - 1000
र्इ्र.पू. का साबित (भाषा के विकास के आधार पर भी) हो चुका है। हडप्पा
के साथ - साथ विश्व की पांच - छह जगहों की सभ्यतायें सबसे प्राचीन
साबित हो चुकी हैं। ............. दरअसल हडप्पा में
पहली बार मनुष्य ने एक साथ रहना ( सही मायने में सभ्य होना) सीखा था।
इसके पूर्व की किसी सभ्यता के कोई प्रमाण आज मौजूद नहीं हैं..........
हां आस्तिक लोग उत्साह में सतयुग - कलजुग की बात करने लगते हैं जो
धार्मिक दृष्टिकोण से तो ठीक है पर वैज्ञानिक, तार्किक एवं साक्ष्य के
दृष्टिकोण से नहीं............
इतिहासबोध
मैं
किसी इतिहासकार द्वारा दिए गए वृतांत या शोध काे अंतिम नहीं मान सकता,
चाहे वे पश्चिम के हों या भारतीय। कई पुस्तकों और इतिहास को गहराई से
पढ़ने से सिर्फ एवं चीज हासिल होती है - इतिहासबोध। ..................
और मेरा इतिहास बोध यह कहता है कि किसी भी सभ्यता या जीवनस्तर का एक
नियत एवं क्रमिक विकास होता है..... ऐसा नहीं होता कि किसी एक क्षेत्र
में तो हम प्राैद्योगिकी के चरम पर पहुंच
जायें और दूसरे क्षेत्र में प्राथमिक अवस्था में हो............ विकास
अन्योन्याश्रित होता है। ऐसा कभी नहीं हो सकता कि केले के पत्ते लपेट
कर हम मिसाइल का परीक्षण करें। .............................. ..........
यदि नाभिकीय बम या उससे उन्नत किसी प्राैद्योगिकी के होने का
साक्ष्य है ताे अन्य चीजें भी उतनी ही उन्नत अवस्था में मिलनी चाहिए
थीं............... हड़प्पावासी मृदभांड का प्रयोग करते थे एवं उनकी
स्थापत्य कला/ मूर्तिकला/ बाजार योजना इत्यादि प्राथमिक स्तर की ही
थीं............. वे क्रमश: सभ्य हो रहे थे और अनुशासित समाज के रूप में
विकसित हो रहे थे...................माफ करें नाभिकीय बम की तकनीक जानने
वाला समाज मृदभांड का प्रयोग नहीं कर सकता, उसकी लिपि अविकसित नहीं हो
सकती, ...................... हां यदि हडप्पा की भविष्य में होने वाली
खुदाई में मोबाइल फाेन/ कंप्यूटर या संचार प्रणाली के स्पष्ट सबूत मिल
जायें तो नाभिकीय बम या उन्नत सभ्यता की बात 'लॉजिकल' हो जायेगी। तब
तक मैं अन्य सभी कयासों को कपोल कल्पना एवं प्राचीन भारत के प्रति
भावुकता ही मानूंगा..................
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